Monday, 5 August 2019

क्या है अनुच्छेद 370 और 35ए, जो जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देता था

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सोमवार को राज्यसभा में केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 और अनुच्छेद 35ए को हटाने का प्रस्ताव पेश किया.

Srinagar: Security personnel stand guard during restrictions and strike called by separatists against Prime Minister Narendra Modi's visit to the state, at Lal Chowk, in Srinagar, on Saturday. (PTI Photo/S Irfan) (PTI5_19_2018_000049B)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: गृह मंत्री अमित शाह द्वारा पेश किए गए प्रस्ताव में लद्दाख को जम्मू कश्मीर से अलग करने का प्रावधान रखा गया है. जम्मू कश्मीर और लद्दाख केंद्र शासित प्रदेश होंगे. जम्मू कश्मीर में विधानसभा होगी, जबकि लद्दाख बिना विधानसभा के केंद्र शासित प्रदेश होगा.

अनुच्छेद 370 को 17 अक्टूबर 1949 को भारत के संविधान में शामिल किया गया था. इसके तहत जम्मू कश्मीर को अपना एक अलग संविधान बनाने और भारतीय संविधान (अनुच्छेद 1 और अनुच्छेद 370 को छोड़कर) को लागू न करने की इजाजत दी गई है.

अनुच्छेद 370 जम्मू कश्मीर के संबंध में संसद की विधायी शक्तियों को प्रतिबंधित करता है. ‘इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन’ (अधिमिलन पत्र) में शामिल किए गए विषयों से संबंधित किसी केंद्रीय कानून को जम्मू कश्मीर में लागू करने के लिए राज्य सरकार का परामर्श लेना जरूरी होता है.

भारत और पाकिस्तान के बटवारे के बाद इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन लाया गया था. इसके जरिए करीब 600 रियासतों को भारत या पाकिस्तान में शामिल होने का प्रस्ताव रखा गया. भारत में शामिल होने के लिए इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन के जरिए जम्मू कश्मीर समेत अन्य रियासतों ने नियम और शर्तें रखी थीं.

नियम के मुताबिक इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन में लिखित सभी वादों का सम्मान किया जाना चाहिए और अगर इनका उल्लंघन होता है तो दोनों पक्ष अपनी शुरुआती स्थिति में लौट सकते हैं. जम्मू कश्मीर के अलावा अन्य राज्यों को भी अनुच्छेद 370 के तहत (अनुच्छेद 371ए से लेकर अनुच्छेद 371आई तक) विशेष दर्जा दिया गया है.

अनुच्छेद 35ए अनुच्छेद 370 से ही निकला है. साल 1954 में राष्ट्रपति के एक आदेश के माध्यम से इसे शामिल किया गया था. अनुच्छेद 35ए राज्य के स्थायी निवासियों का परिभाषित करने और उन्हें विशेष अधिकार और सुविधा प्रदान करने के लिए जम्मू कश्मीर विधायिका को अधिकार देता है.

अनुच्छेद 35ए के तहत राज्य में जमीन खरीदने से संबंधित कुछ विशेषाधिकार वहां के नागरिकों को दिए गए हैं.

इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर करते वक्त जम्मू कश्मीर के लिए क्या शर्तें रखी गईं

जम्मू कश्मीर के लिए बने इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन में लिखा गया है कि संसद को जम्मू कश्मीर के संबंध में सिर्फ रक्षा, विदेश और संचार से संबंधित कानून बनाने का अधिकार है. जम्मू कश्मीर के तत्कालीन राजा हरि सिंह ने इस पर हस्ताक्षर किया था.

जम्मू कश्मीर के इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन के क्लॉज 5 में राजा हरि सिंह ने उल्लेख किया है कि इस इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन को किसी भी संशोधन के जरिए परिवर्तित नहीं किया जा सकता, जब तक कि इस तरह का संशोधन मेरे द्वारा इस अधिमिलन पत्र की जगह पर एक अन्य अधिमिलन पत्र के जरिए स्वीकार न किया जाए.

राजा हरि सिंह ने शुरु में स्वतंत्र रहने का फैसला किया था और भारत एवं पाकिस्तान से किसी भी देश में शामिल नहीं होना चाहते थे. लेकिन बाद में जब कबाईलियों और सादे कपड़ों में पाकिस्तान की सेना ने कश्मीर पर हमला किया तो हरि सिंह ने भारत से मदद मांगी.

तब भारत ने कहा कि अगर वे जम्मू कश्मीर के इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर करते हैं, तो भारत मदद कर सकता है. इसके बाद हरि सिंह ने 26 अक्टूबर 1947 को इंस्ट्रूमेंट ऑफ एक्सेशन पर हस्ताक्षर और तत्कालीन गवर्नर जनरल लॉर्ड माउंटबेटेन ने 27 अक्टूबर 1947 को इसे स्वीकार किया.

भारत की उस समय की ये नीति थी कि जहां कहीं भी भारत में शामिल होने या न होने को लेकर विवाद है, वहां पर जनता के फैसले के आधार पर निर्णय किया जाएगा न कि किसी राजा द्वारा लिया गया एकतरफा निर्णय पर.

उस समय लॉर्ड माउंटबेटेन ने कहा था कि सरकार की ये इच्छा है कि जैसे ही कश्मीर में कानून व्यवस्था बहाल हो जाती है और वहां से आक्रमणकारी बाहर कर दिए जाते हैं, वैसे ही राज्य को भारत में शामिल करने का फैसला वहां के लोगों द्वारा लिया जाएगा.

साल 1948 में भारत सरकार द्वारा जम्मू कश्मीर पर पेश किए गए श्वेत पत्र में लिखा गया है कि भारत में कश्मीर का शामिल होना पूरी तरह से अस्थायी और अल्पकालीन है.

जम्मू कश्मीर के पूर्व मुख्यमंत्री शेख अब्दुल्ला को 17 मई 1949 को वल्लभभाई पटेल और एन. गोपालास्वामी अइयंगर की सहमति से लिखे एक पत्र में पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भी यही बात दोहराई थी.

क्या अनुच्छेद 370 अस्थाई है?

27 मई 1949 को संविधान सभा द्वारा अनुच्छेद 370 को पारित किया गया था. इस प्रस्ताव को पेश करते हुए अइयंगर ने कहा था कि यद्दपि अधिमिलन पूरा हो गया है लेकिन भारत ने प्रस्ताव दिया था कि जब कश्मीर में स्थिति में सामान्य होती है उस समय वहां पर जनमत संग्रह कराया जाएगा और जनता भारत में शामिल होने का प्रस्ताव नहीं मानती है तो कश्मीर द्वारा खुद को भारत से अलग करने को लेकर हम बीच में नहीं आएंगे.

अनुच्छेद 370 संविधान के भाग 21 का पहला अनुच्छेद है, जिसमें में ‘अस्थायी, परिवर्ती और विशेष प्रावधान’ वाली चीजें शामिल की गई हैं. अनुच्छेद 370 अस्थायी है या नहीं, इसे लेकर विवाद है. एक तरीके से देखें तो जम्मू कश्मीर संविधान सभा को इसमें परिवर्तन/हटाने/कायम रखने का अधिकार था और उन्होंने इस कायम रखा.

एक अन्य पक्ष ये है कि जनमत संग्रह होने तक जम्मू कश्मीर का भारत में शामिल होना अस्थायी था. पिछले साल केंद्र सरकार ने लोकसभा में कहा था कि अनुच्छेद 370 को हटाने का कोई प्रस्ताव नहीं है. दिल्ली हाईकोर्ट ने कुमारी विजयालक्ष्मी (मामले) में याचिका खारिज कर दी थी जिसमें कहा गया था कि अनुच्छेद 370 अस्थायी है और इसे बनाने संविधान के साथ फ्रॉड है.

अप्रैल 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि ‘अस्थायी’ शब्द का उपयोग करने वाले हेडनोट के बावजूद, अनुच्छेद 370 अस्थायी नहीं है. संपत प्रकाश (1969) मामले में सुप्रीम कोर्ट ने धारा 370 को अस्थायी मानने से इनकार कर दिया था.

अनुच्छेद 370 में अनुच्छेद 1 का उल्लेख है, जिसके जरिए जम्मू कश्मीर को भारत के राज्यों की सूची में शामिल किया गया है. इसका उल्लेख इस तरह किया जाता है कि अनुच्छेद 370 वो सुरंग है जिसके जरिए भारत के संविधान को जम्मू कश्मीर में लागू किया जाता रहा है.

भारत ने भारतीय संविधान को जम्मू कश्मीर में लागू करने के लिए कम से कम 45 बार अनुच्छेद 370 का इस्तेमाल किया है .यह एकमात्र तरीका है जिसके माध्यम से, राष्ट्रपति आदेशों के द्वारा, भारत ने जम्मू-कश्मीर की विशेष स्थिति के प्रभाव को लगभग शून्य कर दिया है.

साल 1954 के आदेश के जरिए, लगभग पूरे संविधान को जम्मू कश्मीर तक बढ़ा दिया गया था, जिसमें अधिकांश संवैधानिक संशोधन भी शामिल थे.

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