Wednesday, 7 August 2019

जम्मू कश्मीर से बाहर रह रहे छात्रों और लोगों ने कहा, अनुच्छेद 370 ख़त्म करना तानाशाही

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कश्मीर घाटी में रह रहे अपने परिवार से बात न होने पाने की वजह से लोग चिंतित. लोगों का कहना है कि यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने ऐसा फैसला किया है जिससे शांति स्थापित होने की जगह आक्रोश और भड़केगा.

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

(फाइल फोटो: रॉयटर्स)

नई दिल्ली/जम्मू/चेन्नई: दिल्ली में रह रहे कश्मीरी छात्रों और लोगों ने अनुच्छेद 370 को खत्म करने के केंद्र सरकार के कदम को तानाशाही करार देते हुए घाटी में रह रहे अपने परिवारों की सुरक्षा को लेकर चिंता जताई है.

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय छात्रसंघ (जेएनयूएसयू) की पूर्व सदस्य शेहला राशिद ने कहा कि वह इस मामले में सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाएंगी. राशिद पूर्व आईएएस अधिकारी शाह फैसल की राजनीतिक पार्टी जम्मू कश्मीर पीपुल्स मूवमेंट (जेकेपीएम) की भी सदस्य हैं.

उन्होंने ट्वीट कर कहा, ‘हम इस आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देंगे. सरकार की जगह राज्यपाल और संविधान सभा की जगह विधानसभा करना संविधान के साथ धोखाधड़ी है. प्रगतिशील तबकों से एकजुटता दिखाने की अपील करती हूं. आज दिल्ली और बेंगलुरु में प्रदर्शन होगा.’

राशिद ने यह भी दावा किया कि कश्मीरी लोगों के मोबाइल फोन की इंटरनेट स्पीड को भी धीमा कर दिया गया है.

उन्होंने ट्वीट कर कहा, ‘मैं वाई-फाई की मदद से सिर्फ ट्विटर पर पोस्ट कर पाई. राज्य से बाहर चल रहे सभी कश्मीरी लोगों के मोबाइल इंटरनेट को भी प्रतिबंधित किया गया है.’

वहीं जेएनयूएसयू के महासचिव एजाज अहमद राठेर ने कहा, ‘संसद के सदन से असंवैधानिक और तानाशाहीपूर्ण काम किए जा रहे हैं. हमारे लिए कुछ बचा नहीं है. मैंने अपने परिवार से रविवार रात में बात की थी और उन्होंने मुझे एक बार आकर हमें देख लो कहा. कश्मीर में सब कुछ बंद के बाद हम अपने परिवारों से संपर्क करने में सक्षम नहीं हैं.’

वहीं कश्मीर के अनंतनाग के रहने वाले जेएनयू के एक पूर्व छात्र मुद्दसीर ने कहा, ‘हम अनिश्चितता में जी रहे हैं. हम नहीं जानते हैं कि संपर्क के सारे माध्यम बंद करने के बाद वह कैसे जी रहे हैं. कुछ दिन पहले मैंने अपने परिवार से बात की थी और वह चाहते थे कि मैं उनसे आकर मिल लूं. मैंने सोमवार के लिए अपना टिकट भी बुक किया था लेकिन इस स्थिति में मुझे अपना टिकट रद्द करना पड़ा. मुझे वहां अपने लोगों की चिंता हो रही है.’

दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले कश्मीर के एक छात्र अनीस अहमद ने बताया, ‘हर महीने कश्मीर में घबराहट वाली स्थिति रहती है. मैं और मेरा परिवार दोनों एक-दूसरे की सुरक्षा के लिए चिंतित रहते हैं. मैं अपने परिवार से शनिवार से बात नहीं कर पाया हूं. पता नहीं कि वे लोग कैसे हैं… शनिवार को उन्होंने मुझसे कहा था कि कुछ समय के लिए घर न आना.’

नाम जाहिर नहीं करने की शर्त पर जामिया मिलिया इस्लामिया विश्वविद्यालय के एक कश्मीरी छात्र ने कहा कि उनके परिवार ने उनसे विश्वविद्यालय परिसर से बाहर नहीं जाने और अजनबियों से बात नहीं करने के लिए कहा है.

वहीं इसी विश्वविद्यालय के एक छात्र ने कहा, ‘अगर यह घटनाक्रम हमारे पक्ष में है, जैसा कि सरकार दावा कर रही है तो इस तरह की घबराहट वाली स्थिति क्यों तैयार की गई? अगर हम साथ आ रहे हैं तो क्या यह एक अच्छी चीज नहीं है? इस तरीके से आतंक का माहौल क्यों तैयार किया गया? क्यों इंटरनेट सेवा निलंबित की गई?’

केंद्र सरकार ने सोमवार को सभी राज्यों को निर्देश दिया है कि वह जम्मू कश्मीर के राज्य के लोगों का विशेष ध्यान रखें ताकि शांति भंग न हों.

मालूम हो कि बीते चार अगस्त को जम्मू कश्मीर छात्र इकाई ने घाटी से बाहर रह रहे कश्मीरी छात्रों के लिए परामर्श जारी किया था कि वे सोशल मीडिया पर किसी भी तरह की विवादित टिप्पणी करने से बचें और अफवाहों पर ध्यान न दें.

बीते पांच अगस्त को केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने राज्यसभा में एक संकल्प पेश किया जिसमें जम्मू कश्मीर राज्य से संविधान के अनुच्छेद 370 (1) के अलावा सभी खंडों को हटाने और राज्य का विभाजन जम्मू कश्मीर एवं लद्दाख के दो केंद्र शासित क्षेत्रों के रूप में करने का प्रस्ताव किया गया है.

जम्मू कश्मीर केंद्र शासित क्षेत्र की अपनी विधायिका होगी जबकि लद्दाख बिना विधायिका वाला केंद्रशासित क्षेत्र होगा.

जम्मू कश्मीर को विशेष दर्जा देने वाले अनुच्छेद 370 को हटाने का वादा भाजपा ने अपने चुनावी घोषणा-पत्र में भी किया था. इस फैसले का मकसद दशकों पुराने अलगाववादी आंदोलन को समाप्त करना है.

कश्मीर के लोगों ने कहा, हमने अपनी पहचान खोई

अनुच्छेद 370 को हटाए जाने के सरकार के फैसले के मद्देनजर कश्मीर के लोगों ने घाटी में हिंसा का नया दौर शुरू होने की आशंका जताई और कहा कि इससे राज्य की मुस्लिम बहुलता वाली पहचान में बदलाव हो सकता है.

जम्मू आए श्रीनगर निवासी फारूक अहमद शाह (50) ने कहा, ‘हम फैसले से चकित हैं और इसने हमें निराश कर दिया है क्योंकि इस अनुच्छेद के साथ हमारी भावनाएं जुड़ी थीं… इसे खत्म करने का मतलब है कि राज्य अपनी मुस्लिम बहुलता वाली पहचान खो देगा.’

उन्होंने कहा कि अनुच्छेद को खत्म किए जाने से लोगों का गुस्सा भड़क सकता है.

जम्मू घूमने आए घाटी निवासी 20 वर्षीय अर्शिद वारसी ने कहा, ‘वे (सरकार) हमें कब तक नजरबंद रखेंगे?’ उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 को खत्म करने का मतलब यह नहीं है कि हम अपना आक्रोश व्यक्त नहीं कर सकते.

इस संबंध में एक महिला शिक्षक ने वर्तमान स्थिति के लिए राज्य के मुख्यधारा के दलों को जिम्मेदार ठहराया.

उन्होंने कहा, ‘आज हमें लगता है कि हमने अपनी पहचान खो दी है. यह अत्यंत दुर्भाग्यपूर्ण है कि सरकार ने ऐसा फैसला किया है जिससे शांति स्थापित होने की जगह आक्रोश और भड़केगा.’

कारोबारी जलील अहमद भट ने कहा कि घाटी में अनिश्चितता के चलते उनका कारोबार अनिश्चितकाल के लिए बंद रहेगा और रोजी-रोटी के लाले पड़ जाएंगे. उन्होंने कहा, ‘हमें नहीं पता कि कर्फ्यू जैसे प्रतिबंध हटने के बाद क्या स्थिति होगी. हमें लगता है कि हम सबसे खराब समय की ओर बढ़ रहे हैं.’

भट ने राज्य में फोन और इंटरनेट सेवाएं बंद किए जाने पर निराशा जताई और कहा कि घाटी के लोग बाहरी दुनिया से पूरी तरह कट गए हैं.

उन्होंने कहा, ‘मेरे दो बच्चे राज्य से बाहर पढ़ रहे हैं और उनसे मेरा कोई संपर्क नहीं है. मुझे पता है कि वे यहां स्थिति को लेकर चिंतित होंगे और मुझे यह भी नहीं पता कि वे कैसे होंगे.’

फातिमा बानो ने नाम की एक महिला ने कहा, ‘क्या अनुच्छेद 370 को खत्म करने से कश्मीर में दशकों पुरानी अशांति खत्म होगी? मुझे ऐसा नहीं लगता.’ उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 370 या 35 ए विस्थापित कश्मीरी पंडितों की वापसी में कोई बाधा नहीं थे.

जम्मू में रह रहीं नुसरत ने कहा, ‘हमें नहीं पता कि कश्मीर में क्या हो रहा है? मैंने वहां अपने परिजनों से बात की जिनसे पता चला कि वहां सुरक्षाबलों की भारी तैनाती की गई है.’ अपनी बहन की शादी के लिए दिल्ली से खरीददारी कर लौट रहे फैयाज अहमद डार ने कहा कि घाटी के घटनाक्रमों से उसका दिल टूट गया है.

तमिलनाडु में रह रहे कश्मीरियों ने अनुच्छेद 370 ख़त्म करने को अप्रत्याशित कदम बताया

केंद्र द्वारा अनुच्छेद 370 के प्रावधानों को खत्म करना दशकों से तमिलनाडु में रह रहे जम्मू-कश्मीर के निवासियों के लिए अप्रत्याशित कदम है और कुछ लोगों को जहां इससे उम्मीद है वहीं कुछ निराश भी हैं.

कुछ लोगों ने कहा कि इसके दूरगामी परिणाम क्या होंगे उसका अंदाजा नहीं है वहीं कुछ अन्य ने उम्मीद जताई कि इस कदम से राज्य के लोगों को मदद मिलेगी.

चेन्नई में फैशन ज्वैलरी स्टोर के कर्मचारी अशरफ ने कहा कि अनुच्छेद खत्म करना अवैध काम है जिसे कश्मीरी लोगों के हित के बारे में सोचे बगैर किया गया है.

उन्होंने आश्चर्य जताया कि सरकार राज्य के लोगों से विचार-विमर्श किए बगैर और उनके विचार जाने बगैर इस तरह का उग्र बदलाव कैसे कर सकती है.

उसने कहा, ‘इससे आम आदमी प्रभावित होगा.’

एक दशक पहले चेन्नई आए उनके सहयोगी श्रीनगर के रहने वाले उमर ने अपने परिवार के साथ बातचीत नहीं हो पाने पर चिंता जताई.

उन्होंने भी जम्मू कश्मीर को विशेष राज्य का दर्जा दिए जाने वाले प्रावधान खत्म करने पर अशरफ से इत्तेफाक जताया.

हैंडीक्राफ्ट और हैंडलूम स्टोर चलाने वाले अहमद रफीक ने कहा कि केंद्र की पहल ऐसे समय में आई है जब लोग दशकों से वहां चल रही अशांति से त्रस्त हैं.

अनुच्छेद 370 पर उन्होंने कहा कि वह 1990 के दशक के शुरुआत में ही घाटी छोड़कर आ गया था जब आतंकवाद चरम पर था और वह नहीं कह सकता कि अनुच्छेद को खत्म करना अच्छा या बुरा है और आगामी हफ्ते या महीने में चीजें कैसे बदलती हैं.

जम्मू के रहने वाले और चेन्नई में मोटर स्पेयर पार्ट्स कंपनी में काम करने वाले हरमिंदर ने कहा कि अनुच्छेद 370 लागू रहने और केंद्र सरकार से अन्य सहयोग मिलने के बावजूद जम्मू कश्मीर में दशकों से शांति नहीं थी और विकास नहीं हो पा रहा था.

उन्होंने कहा, ‘इस सरकार ने कुछ नया किया है. हम उम्मीद करते हैं कि इससे लोगों के लिए अच्छा होगा, व्यवसाय के नए अवसर आएंगे और पर्यटक बढ़ेंगे.’

इससे हमारी दासता समाप्त होगी.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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