ख़बरनवीस ख़ुद ख़बर बन जाए यह बिरले होता है - Badhata Rajasthan - नई सोच नई रफ़्तार

Breaking

Sunday, 4 August 2019

ख़बरनवीस ख़ुद ख़बर बन जाए यह बिरले होता है

किसी एक पत्रकार को तब कितना अकेलापन लगता होगा जब उसके सारे हमपेशा ख़ुद को राष्ट्रनिर्माता या राष्ट्ररक्षक मान बैठे हों! रवीश कुमार इसी बढ़ते अकेलेपन के बीच उसी को अपनी शक्ति बनाकर काम करते रहे.

Ravish Kumar Photo The Wire

पत्रकार रवीश कुमार. (फोटो: द वायर)

यह बिरले होता है कि ख़बरनवीस ख़ुद ख़बर बन जाए. पिछले तीन रोज़ से एक ख़बरची ही ख़बर है: रवीश कुमार.

याद आती है कोई 18 साल पहले रवीश से एक मुलाक़ात. ‘दिक्कत यह हुई है टेलीविज़न की दुनिया में कि जिसे ख़बर दिखाने का काम है, वह सोच बैठा है कि लोग समाचार नहीं, उसे देखने टीवी खोलते हैं.’ रवीश ने कहा. उस वक़्त वे रिपोर्टिंग का काम कर रहे थे.

हमने महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में अपने संघर्ष को लेकर उनसे रिपोर्टिंग का अनुरोध किया था. रिपोर्ट बनी, लेकिन रवीश ने कहा, ‘माफ कीजिए, कमज़ोर रिपोर्ट है!” कोई रिपोर्टर यह कहे, तब भी यह सोचना भी मुश्किल था, आज तो है ही.

तब से वक़्त कितना बदल गया है. तब से अब तक काफी ख़ून भारत की सड़कों पर बहकर सूख चुका है. काफी नफ़रत हमारी नसों में पैठ चुकी है और मूर्खता हमारे दिमाग़ों को जड़ कर चुकी है.

जो ताकतवर माने जाते थे, कायरता ने उनकी रीढ़ तोड़ दी है, इसीलिए अपनी कायरता को हमने आभूषण बना लिया है और जो कायर नहीं है उससे हम घृणा करने लगे हैं.

संस्थानों ने, चाहे वे विश्वविद्यालय हों, या जनसंचार माध्यम अपनी भूमिका बदल ली है. हम जो इस भुलावे में थे कि हम तर्क करनेवाले लोग हैं, अनुयायियों में बदल गए हैं.

भाषा, जिसका काम यथार्थ को दिखाने का था, उसे ढंकने का परदा बन गई है. जिज्ञासा अपराध बन गई और आलोचना आतंकवादी षड्यंत्र.

यही समय था जिसमें रवीश धीरे-धीरे निखरकर परिदृश्य पर उभर आए. जो उन्होंने कहा था, विडंबनापूर्ण ढंग से उनपर लागू होने लगा. लाखों लाख लोग रात के नौ बजे रवीश कुमार को देखने के लिए टीवी खोलने लगे.

बिहार हो या बंगाल, ओडिशा हो या केरल, गुजरात हो या महाराष्ट्र, हर जगह, हवाई अड्डा हो या ट्रेन, मेट्रो हो या बस, कोई न कोई आकर आपसे रवीश कुमार का हालचाल ज़रूर पूछ लेता है. कई लोग आकर उनकी ख़ैरियत की दुआ कर जाते हैं.

मैंने नामवर सिंह को इतना बेचैन नहीं देखा था जितना पटना के होटल में रात के नौ बजे एनडीटीवी हिंदी न मिलने पर वे हुए थे. यह कोई चमत्कार नहीं.

रवीश कुमार ने चूंकि अपना धर्म नहीं छोड़ा, लोगों ने उन पर यक़ीन किया. धर्म पत्रकारिता का था.

यह भी पढ़ें: कौन हैं जो देवता होने की योग्यता रखते हैं, जिनके लिए पत्रकार नारद बन जाएं

तक़रीबन सौ साल पहले माखनलाल चतुर्वेदी ने लिखा था, पत्रकार का काम तो एक अकादमिक व्यक्ति से भी अधिक ज़िम्मेदारी का होता है. अकादमिक लेखन में चूक को दूसरा उसी क्षेत्र का माहिर दुरुस्त कर लेगा. लेकिन अगर अख़बार में चूक हो गई तो उसे पढ़नेवालों के पास उसे सुधारने का कोई ज़रिया नहीं.

इसलिए उस भारतीय आत्मा ने पत्रकारों को उनका कर्तव्य याद दिलाया, उन्हें अतिरिक्त श्रम करना है, दूनी सावधानी बरतनी है. वे लाखों लोगों का नज़रिया जो बना रहे हैं!

वही माखनलाल चतुर्वेदी अगर 20वीं सदी के अंतिम दशक के हिंदी अख़बार पढ़ते तो उनका सिर लज्जा से झुक जाता. यहां चूक न थी. सोचा-समझा फ़ैसला था, झूठ बोलने का, मुसलमानों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने का.

यह हिंदी पत्रकारिता का स्वभाव बन गया. रामजन्मभूमि आंदोलन के दौरान रघुवीर सहाय के नेतृत्व में एडिटर्स गिल्ड की रिपोर्ट में यह बात तकलीफ़ से दर्ज की गई.

और फिर साथ-साथ टीवी भी आया. टीवी ख़बर दिखाने की जगह राय दिखाने लगा बल्कि रायों के बीच कुश्ती कराने लगा. ख़बर देना उसका काम न रह गया.

टीवी में एंकर नामक एक संस्था ने जन्म लिया. इस गुमान के साथ कि वह समाज का नज़रिया तय कर रहा है. इस अहंकार के साथ कि वह अंपायर है. वह भूल गया अपने पुरखों की चेतावनी को.

पत्रकार का काम समाज को ख़बरदार करने का है. वह पहरेदार भी है. ‘जागते रहो’ की पुकार लगाते रहना उसका फ़र्ज़ है.

पत्रकार स्वाभाविक तौर पर इंसाफ़ के साथ होता है. वह कमज़ोरों का पक्षधर होता है. वह सत्ता, चाहे वह कोई भी हो, धन की या राजनीति की, उसका चिरंतन विपक्ष होता है.

दूसरे शब्दों में, वह आलोचक के अलावा और कुछ हो नहीं सकता. अभ्यर्थना उसका काम नहीं. अकेलापन उसकी नियति है.

‘स्पॉटलाइट‘ फिल्म का दृश्य याद आता है जिसमें ताकतवर चर्च का पादरी संपादक से दोस्ताना अंदाज में कहता है कि आपका अख़बार और हमारा चर्च, दो महान संस्थाएं हैं. कैसा रहे अगर दोनों मिलकर काम करें! और संपादक विनम्रतापूर्वक जवाब देता है कि अख़बार बेहतर काम तभी करता है जब वह अकेले काम कर रहा हो.

किसी एक पत्रकार को लेकिन तब कितना अकेलापन लगता होगा जब उसके सारे हमपेशा ख़ुद को राष्ट्रनिर्माता या राष्ट्ररक्षक मान बैठे हों! रवीश कुमार इसी बढ़ते अकेलेपन के बीच उसी को अपनी शक्ति बनाकर काम करते रहे.

यह मुश्किल था. यह बंजर में फूल खिलाने जैसा काम था लेकिन रवीश ने अपनी खुरपी या कुदाल नहीं छोड़ी. वे ज़मीन तोड़ते रहे.

रवीश आज क्या कहनेवाले हैं? यह उत्सुकता तो हर रात उनके दर्शकों को रहती ही है, आज का उनका अंदाज क्या है, यह कौतूहल भी उन्हें रहता है. शायद ही किसी पत्रकार को, वह भी दृश्य माध्यम के, शैलीकार की प्रतिष्ठा मिली है.

क्या है रवीश की ताकत? ज़मीन पर लगे उनके कान? वह है! ख़बर की पहचान? वह तो है ही! लेकिन इन सबसे बढ़कर मेहनत! किसी विषय पर बात करने के पहले उसे समझने की विनम्रता. सतहीपन से संघर्ष! गहराई में जाने की कोशिश!

रवीश के दर्शक सिर्फ उनकी पक्षधरता की वजह से नहीं, उनकी सही राजनीति की वजह से नहीं, उनके इन गुणों की वजह से उनके मुरीद बने हैं.

इस कारण भी कि रवीश कुमार में नैतिक स्पष्टता है. वे जानते हैं कि हत्या और ज़ुल्म में हत्यारे के पक्ष को समझने की जब वकालत की जाती है, जब हिंसा को विवाद का विषय बन दिया जाता है तो यह निष्पक्षता नहीं, धोखाधड़ी है!

अगर इस देश के बेरोज़गार युवा, देशभर के जर्जर होते कॉलेजों में पढ़ने और पढ़ानेवाले, बैंककर्मी, रेलवेकर्मी, मज़दूर, किसान, दलित, ईसाई और मुसलमान रवीश कुमार से प्यार करते हैं तो क्यों?

क्योंकि रवीश कुमार हिंदुस्तान का दुखता हुआ दिल है.

मुक्तिबोध के शब्दों में वह हृदय जो रक्त का उबलता हुआ तालाब है. वह रोशनी जो ख़ुद को जलाकर पैदा की जाती है.

आइए, दुआ करें कि यह चिराग़ रोशन रहे. जब तक वह जलता है, हिंदुस्तान की सांस चलती है!

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)

The post ख़बरनवीस ख़ुद ख़बर बन जाए यह बिरले होता है appeared first on The Wire - Hindi.

No comments:

Post a Comment