Saturday, 10 August 2019

आप कश्मीरियों को आंख दिखा सकते हैं, उनकी आंखों में देखकर बात करने का साहस नहीं रहा

0 comments

जिन पर फैसले का असर होने वाला हो, उन्हें अंधेरे में रखकर लिया गया कोई भी निर्णय किसी भी तर्क से उनके हित में नहीं हो सकता. अपनी सैन्य शक्ति के बल पर अभिभावकत्व हासिल करना आपके दावे को किसी भी तरह जायज़ नहीं बना सकता.

Residents cross a street during restrictions in Srinagar. (Photo:Reuters)

फोटो: रॉयटर्स

5 अगस्त कश्मीर का रॉलेट एक्ट क्षण है. भारत के लिए वह क्या है, यह अभी हमें ठीक ठीक नहीं मालूम. लेकिन अगर आप राजनेताओं से लेकर सामान्य जनता की प्रतिक्रिया पर ध्यान दें तो 5 अगस्त ने फिर भारत को दो टुकड़ों में बांट दिया है.

यह कहना बुरा लग सकता है लेकिन 5 और 6 अगस्त को भारत की संसद ने कश्मीर का विशेष दर्जा छीनकर और उसके टुकड़े करने का जो फैसला किया उसके पक्ष में खुशियां मनाते हुए जो दिखलाई पड़ रहे हैं, वे क्या इत्तफाकन ही हिंदू हैं और वास्तव में भारतीय हैं?

इस राष्ट्रवादी उल्लास में क्यों इस देश का बड़ा तबका शामिल नहीं महसूस कर पा रहा? वह सिर्फ मुसलमान नहीं है. ईसाई, सिख, पारसी… इनमें से किसी को इस उल्लास में शामिल होने का कोई उत्साह नहीं. मणिपुर, नागालैंड के लोग इस कदम में अपनी ज़मीन पर भी भारतीय फौजी बूट की धमक सुन रहे हों, तो ताज्जुब नहीं!

कश्मीर की मांग और स्वायत्तता की थी. उस पर विचार करने की जगह उसे सीधे केंद्र शासित प्रदेश में बदल कर दिल्ली के सीधे नियंत्रण में ले आने से कश्मीरी जनता को गहरा मनोवैज्ञानिक सदमा लगा है.

इसकी प्रतिक्रिया की आशंका से ही भारत की सरकार ने कश्मीर पर ताला लगा दिया. उसके सभी नेताओं को गिरफ्तार कर लिया गया. ऐसा कोई भी सत्ता कब करती है? जब वह जनता का सामना नहीं कर सकती.

जिन पर उसका असर होनेवाला हो, उन्हें अंधेरे में रखकर लिया गया कोई भी निर्णय किसी भी तर्क से उनके हित में नहीं हो सकता. अपनी सैन्य शक्ति के बल पर अभिभावकत्व हासिल करना आपके दावे को किसी भी तरह जायज़ नहीं बना सकता.

यह तर्क सिर्फ गांधी का नहीं, हर स्वाधीनता के पक्षधर का है कि आप मेरी पीठ पर सवार होकर मेरे मित्र और शुभचिंतक होने का दावा नहीं कर सकते. मेरे ऊपर काबिज होने का अधिकार आपको किसी ने नहीं दिया और उसे मैं कबूल नहीं कर सकता.

जो कश्मीर में दहशतगर्द हिंसा के खिलाफ हैं, उनमें से कई गांधी की अहिंसा के भी खिलाफ हैं. अगर वे खुदीराम बोस, चंद्रशेखर आज़ाद के हिंसक संघर्ष के तरीके को उचित मानते हैं तो इस पर भी ध्यान दें कि उनमें से हर एक को मालूम था कि वे ब्रिटिश हुकूमत की ताकत से शायद जीत न सकें. लेकिन विजय न होगी, इस कारण उन्होंने अपने संघर्ष को छोड़ नहीं दिया.

स्वाधीनता का विचार सफलता के आश्वासन से वैधता प्राप्त नहीं करता. इससे भी नहीं कि उससे दुनियावी खुशहाली का रास्ता खुलता है. स्वाधीनता के विचार की वैधता का स्रोत स्वयं उसी में है, उसके बाहर कहीं नहीं.

कश्मीरी आज़ाद रहना चाहते हैं, क्या यह बात इतनी अटपटी है कि हमारी समझ में नहीं आ रही? लेकिन उनकी स्वायत्तता की आकांक्षा क्यों हमारे राष्ट्र निर्माताओं को स्वाभाविक लगी थी?

क्यों गांधी,पटेल,नेहरू आदि उनके आत्मनिर्णय के अधिकार को वाजिब मानते थे? क्यों हमें वह इच्छा अन्यायपूर्ण लगती है?

कश्मीर की आज़ादी की इस भावना पर बात करना भारत में खतरे से खाली नहीं. तर्क दिया जाता है कि भारत में रहकर पढ़ते, नौकरी और व्यापार करते हुए अपनी आज़ादी की बात कश्मीरी कैसे कर सकते हैं?

ऐसा करनेवाले भूल जाते हैं कि सावरकर, श्यामजीकृष्ण वर्मा लंदन में रहकर अंग्रेज़ी सरकार के खिलाफ सशस्त्र विद्रोह की योजना बना रहे थे.

जो कहते हैं कि कश्मीर के लोग भारत की पुलिस, सरकारी नौकरी में क्यों है अगर वे आज़ाद रहना चाहते हैं, वे ब्रिटिश भारत की पुलिस, सेना और उसके सरकारी तंत्र में भारतीयों की संख्या को भूल जाते हैं.

आख़िर कितने प्रतिशत भारतीय सक्रिय रूप से आज़ादी कि मुहिम में शरीक हुए थे? तो क्या भारत की आज़ादी का ख़याल इस वजह से ग़लत था?

बिट्रेन में ऐसे अंग्रेज भी थे, जो भारत की स्वाधीनता के वकील थे. भारत में अंग्रेज़ी राज का विरोध करने के लिए ब्रिटेन में ख़ासा नैतिक साहस चाहिए था. वह अलोकप्रिय था. लेकिन क्या इससे इनकार किया जा सकता है कि वही उचित और नैतिक था?

ब्रिटेन की जनता के लिए यह समझना कठिन था कि भारत को क्यों आज़ाद होना चाहिए लेकिन क्या उस जनमत के कारण भारत की आज़ादी की आकांक्षा गलत थी?

बिहार, उत्तर प्रदेश, मध्य प्रदेश और राजस्थान के लोगों को भारतीय राष्ट्र का विचार सनातन और स्वाभाविक लगता है. वह उतना ही स्वाभाविक न सिर्फ़ मणिपुर, मिज़ोरम,नगालैंड, त्रिपुरा, मेघालय के लिए था, बल्कि पंजाब, तमिलनाडु जैसे प्रदेशों के लिए भी नहीं था. सारे भारत में फैले हुए आदिवासियों के लिए भी यह राष्ट्र अजनबी-सा ही था.

अगर आंबेडकर और गांधी की बहस को याद कर लें तो समझ सकेंगे कि दलितों के लिए भी इस राष्ट्र से आत्मीयता आसान न थी. भारतीय राष्ट्र के इस विचार को इन सारी आबादियों को अपनी ओर आकर्षित करना था, इन्हें आमंत्रित करना था कि वह उन्हें घर जैसा इत्मीनान दे सके.

View of a deserted road during restrictions in Srinagar, August 5, 2019. REUTERS/Danish Ismail

फोटो: रॉयटर्स

पिछले 70 वर्षों का भारत का इतिहास साक्षी है कि भारतीय राष्ट्र का अर्थ इनमें से सबके लिए कभी भी एक समान न था. उस वजह से भारत का इनसे हिंसक द्वंद्व भी होता रहा है. भारत अगर ताकतवर साबित हुआ कई बार तो सिर्फ इसलिए नहीं कि वह श्रेष्ठ विचार था बल्कि इसलिए कि उसके पास राज्य की हिंसक शक्ति थी.

राज्य द्वारा हिंसा के प्रयोग को जायज़ माना जाता है और जो राज्य ऐसा करते हैं उन्हें अंतरराष्ट्रीय समर्थन ही मिलता है. अपनी जनता के खिलाफ हिंसा के प्रयोग को अंदरूनी मामला कहकर अंतरराष्ट्रीय समुदाय पल्ला झाड़ लेता है.

इस तरह चीन वीगर मुसलमानों के चीनीकरण के जिस क्रूर अभियान में लगा है, उस पर किसी भी सभ्य देश की सरकार उससे कोई सवाल नहीं करती, लेकिन इस वजह से चीन सही साबित नहीं होता.

भारत के विचार में एक नैतिक बल था. वह इस कारण कि वह हर तरह की आबादी को अपने तरीक़े से, अपनी चुनी हुई पहचान के साथ रहने का आश्वासन देता था. संख्या कितनी ही कम क्यों न हो, आवाज़ हर किसी की सुनी जाएगी, यह भरोसा था. इसी कारण अपने साथ ही खड़े हुए पाकिस्तान के मुक़ाबले वह अधिक विश्वसनीय था. उसमें सिर्फ़ विविधता नहीं, भेदभाव का निषेध भी था.

इसी कारण कई आबादियों को, जिन्हें इसका भय था कि उनकी पहचान इस सर्वग्रासी राष्ट्र में शामिल होते ही मिट जाएगी, यक़ीन दिलाया गया कि ऐसा नहीं होगा. स्टालिन यूक्रेन या दूसरे इलाकों का रूसीकरण कर रहा था. फ़िलस्तीन में यहूदियों द्वारा भूमि लेकर बाद में वहां के निवासियों को खदेड़ देने की घटना सामने थी.

इसकी क्या गारंटी थी कि भारतीय राष्ट्र हर आबादी पर एक झंडे और एक विधान के नाम पर हिंदीभाषी उत्तर भारतीय और वह भी ‘सवर्ण हिंदू’ प्रतीकों को नहीं आरोपित करेगा? क्या गारंटी थी कि आदिवासी इलाकों और मणिपुर, हिमाचल प्रदेश, नगालैंड आदि की ख़ास पहचान मिटा नहीं दी जाएगी?

भारतीय राष्ट्रवाद की महत्वाकांक्षा नैतिक रूप से राष्ट्र की पाश्चात्य संकल्पना से बेहतर होने की थी. क्या वह किसी एक समुदाय के स्वार्थों का संगठन मात्र बन कर रह जाएगा?

टैगोर के इस प्रश्न के उत्तर में संविधान ने यह कल्पना पेश की कि यह विविध समुदायों का मैत्रीपूर्ण सहकार होगा जो साथ मिलकर स्वतंत्रता, समानता और न्याय हासिल करने का सफ़र तय करेंगे. इस संकल्प में इसका स्वीकार था कि भेदभाव है, असमानता है, अन्याय है और बंधुत्व एक लक्ष्य है. इस यात्रा में ही बंधुत्व भी रचा जाएगा.

जैसा देखा गया, यह इतना रूमानी नहीं रहा. भारतीय राष्ट्र की कथा रक्तरंजित है. जाने कितनों का ख़ून बहाया गया जिससे इस राष्ट्र का विचार सुर्ख़रू हो.

कश्मीर से हिंदुस्तान का रिश्ता इसी संदर्भ में समझा जाना चाहिए. यह भारत का एकमात्र राज्य था जिसमें मुसलमान की राजनीतिक आवाज़ को नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता था. यह भारत के और किसी हिस्से में न था. साथ ही उसकी अपनी सांस्कृतिक पहचान थी. इसे तोड़ने का सिर्फ़ एक मक़सद है, इस आवाज़ को बेअसर कर देना.

भारतीय जनता पार्टी की राजनीति भारत के किसी हिस्से में मुसलमान प्रभाव को बर्दाश्त नहीं कर सकती. यही कारण है कि उसने असम के हिंदुओं को यह कहकर डराने की कोशिश की कि अगर उसे वोट न दिया तो बदरूद्दीन अजमल मुख्यमंत्री बन जाएंगे. या इसी कारण उसने गुजरात में हिंदुओं को कहा कि कांग्रेस को वोट देने का मतलब है अहमद पटेल का मुख्यमंत्री बन जाना.

किसी ने नहीं पूछा कि क्यों इन दोनों का मुख्यमंत्री बनना डर की वजह होना चाहिए. दूसरी पार्टियां भी यही कहने लगीं कि यह भाजपा का दुष्प्रचार है. भारत के किसी भाग में मुसलमान रंग प्रमुख नहीं हो सकता, उसे हमेशा दोयम रहना होगा, यह भाजपा का राजनीतिक एजेंडा है.

इसमें आखिरी रुकावट कश्मीर ही था. उसे ख़त्म करना भाजपा की राजनीतिक विचारधारा के लिए अनिवार्य था. इसका भारतीय राष्ट्र के अधूरेपन को दूर करने से कोई रिश्ता नहीं.

जम्मू कश्मीर को तोड़ने के फ़ैसले पर जिस तरह की प्रतिक्रिया देश में हुई, उसने कश्मीर के लोगों को भारत से आख़िरी तौर पर दूर कर दिया है. जो घृणा भारत के हिंदुत्ववादियों में कश्मीरी मुसलमानों के ख़िलाफ़ थी, वह अपनी पूरी अश्लीलता और हिंसा के साथ उनके मन के गटर से उबल-उबलकर समाज की सतह पर बह रही है. इसे कश्मीरी झेल रहे हैं.

कश्मीर में जाकर मकान ख़रीदने, अपनी बेरोज़गारी दूर करने और कश्मीरी लड़कियों से शादी बनाने का इरादा पूरे भारत के अलग अलग कोने से जागीर किया जा रहा है. इसके साथ ही पुरानी मुसलमान विरोधी घृणा को नया मौका मिल गया है नंगा नृत्य करने का.

आख़िर और किसी ने नहीं, बिहार के उपमुख्यमंत्री ने साफ बयान दिया है कि संसद के निर्णय से बिहार के लोगों का कश्मीर में रोज़गार करने का रास्ता खुल गया है. इसका मतलब साफ है, यह निर्णय कश्मीर के लोगों के लिए था ही नहीं, यह उसे शेष भारत के लोगों के द्वारा लूटे जाने के लिए था.

यह उन्हें भारतीयों के बराबर अधिकार देने के लिए नहीं, उनपर अपना क़ब्ज़ा पूरा करने के लिए था. कश्मीर के लोगों की आज़ादी की मांग को भारतीय संसद ने अपने कदम से और भारतीय जनता पार्टी कर समर्थकों ने अपनी प्रतिक्रिया से जायज़ बना दिया है. कल तक अगर वहां भारत के समर्थक अगर थे भी, तो अब उनके लिए कोई जगह नहीं बची.

यह किया है भारतीय जनता पार्टी ने. इसे उसके समर्थक नहीं समझ पा रहे हैं तो उनका दोष नहीं. लेकिन बाक़ी राजनीतिक दलों ने जो किया है, उससे भी कश्मीर में यह बात साफ हो गई है कि उनके लिए कोई हमदर्दी भारत के राजनीतिक वर्ग में नहीं है. इसलिए अब उन्हें किसी पर भरोसा नहीं करना होगा.

कश्मीर अब पूरी तरह भारत से अलग कर दिया गया है. कश्मीर का मतलब कश्मीरी जन. आप उनकी ज़मीन पर ज़बर्दस्ती कब्ज़ा कर चुके हैं लेकिन उनका मन अब आपसे पूरी तरह कट चुका है. आप इस क्षण विजेता हैं, उन्हें आंख दिखा सकते हैं, लेकिन आपमें उनकी आंख में आंख डाल कर बात करने का साहस अब नहीं रहा.

(लेखक दिल्ली विश्वविद्यालय में पढ़ाते हैं.)

The post आप कश्मीरियों को आंख दिखा सकते हैं, उनकी आंखों में देखकर बात करने का साहस नहीं रहा appeared first on The Wire - Hindi.

No comments:

Post a Comment