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Tuesday, 3 September 2019

रोमिला थापर समेत 12 प्रोफेसर एमेरिटस से बायोडाटा देने को कहा गया है: जेएनयू प्रशासन

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया कि उसने यह पत्र किसी की सेवा को खत्म करने के लिए नहीं बल्कि विश्वविद्यालय की सर्वोच्च वैधानिक निकाय कार्यकारी परिषद द्वारा समीक्षा करने की जानकारी देने के लिए लिखा है और ऐसा अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों जैसे एमआईटी और प्रिसंटन विश्वविद्यालय में भी होता है.

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: पीटीआई)

जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) प्रशासन ने विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति आशीष दत्ता, जाने-माने वैज्ञानिक आर. राजारमन और इतिहासकार रोमिला थापर समेत 12 प्रोफेसर एमेरिटस से काम की समीक्षा करने के लिए उनका बायोडाटा मांगा है.

प्रोफेसर एमेरिटस एक मानद पद है जो प्रतिष्ठित संकाय सदस्य को उनकी सेवानिवृत्ति के बाद दिया जाता है. प्रोफेसर एमेरिटस उन विभागों में शैक्षणिक काम करने के लिए स्वतंत्र होते हैं जिससे वे सम्बद्ध रहे हैं. साथ में वे नियमित संकाय सदस्यों के साथ एक मूल पर्यवेक्षक के रूप में शोध विद्वानों का पर्यवेक्षण भी कर सकते हैं.

इस पद के लिए अंतरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त शिक्षकों को ही चुना जाता है. जेएनयू में जिस सेंटर से कोई प्रोफेसर सेवानिवृत्त होता है, वह किसी नाम को प्रस्तावित करता है, जिसके बाद संबंधित बोर्ड ऑफ स्टडीज और विश्वविद्यालय के अकादमिक परिषद और कार्यकारी परिषद मंजूरी देते हैं.

प्रोफेसर एमेरिटस पद के लिए शिक्षक को कोई वित्त लाभ यानी सैलरी नहीं मिलती है. उन्हें संबंधित सेंटर में सिर्फ एक कमरा दिया जाता है जहां वह अपने अकादमिक काम करते हैं और कभी-कभी लेक्चर देते हैं. इसके साथ ही शोधकर्ता छात्रों को सुपरवाइज कर सकते हैं.

मालूम हो कि प्रोफेसर एमेरिटस के पद पर बने रहने के लिए इतिहासकार रोमिला थापर का मूल्यांकन करने के लिए उनका बायोडाटा मांगने के जेएनयू प्रशासन के फैसले की विभिन्न तबकों ने आलोचना की है.

रोमिला थापर करीब छह दशकों से शिक्षक और शोधकर्ता रही हैं. उन्हें प्रारंभिक भारतीय इतिहास में विशेषज्ञता प्राप्त है. वह जेएनयू में 1970 से 1991 तक प्रोफेसर थीं और उन्हें 1993 में प्रोफेसर एमेरिटस के तौर पर चुना गया.

बहरहाल, जेएनयू के कुलसचिव (रजिस्टार) ने बीते सोमवार को कहा कि 11 अन्य प्रोफेसर एमेरिटस से भी बायोडाटा देने को कहा गया है.

उधर, विवाद बढ़ने पर सोमवार को मानव संसाधन विकास मंत्रालय ने भी स्पष्टीकरण दिया कि जेएनयू ने किसी भी प्रोफेसर एमेरिटस का दर्जा खत्म करने के लिए कोई कदम नहीं उठाया है.

जेएनयू के कुलसचिव प्रमोद कुमार ने बताया कि विश्वविद्यालय प्रशासन ने प्रोफेसर एचएस गिल, सीके वार्ष्णेय, संजय गुहा, आशीष दत्ता, आर. राजारमन, रोमिला थापर, योगेंद्र सिंह, डी. बनर्जी, टीके ओम्मेन, अमित भादुड़ी और शीला भल्ला को भी पत्र भेजे हैं. ये सभी 31 मार्च 2019 से पहले 75 साल के हो गए हैं.

उन्होंने कहा कि रोमिला थापर समेत कुछ ने अपने जवाब दे दिए हैं और जिन्होंने जवाब नहीं दिए हैं, उन्हें स्मरण-पत्र भेजे जाएंगे और जब उनके जवाब मिल जाएंगे तो एक समिति उनके बायोडाटा की समीक्षा करेगी.

कुमार ने कहा कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रोफेसर एमिरेटस का पद स्थायी नहीं होता है. उन्होंने कहा कि प्रोफेसर एमिरेटस का बायोडाटा मांगने का फैसला विश्वविद्यालय की कार्यकारी परिषद का है.

गौरतलब है कि जेएनयू के पूर्व कुलपति आशीष दत्ता प्रख्यात आणविक जीवविज्ञानी और शिक्षाविद् हैं. उन्हें 1999 में पद्मश्री और 2008 में पद्मभूषण से सम्मानित किया गया था.
उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार और प्रियदर्शनी अवॉर्ड से भी नवाजा गया है.

प्रो राजारमन ने अपनी पीएचडी नोबेल पुरस्कार से सम्मानित हंस बेथ की देखरेख में की थी. बेथ को 1967 में ‘स्टेलर न्यूक्लियोसिंथेसिस’ के सिद्धांत पर काम के लिए नोबेल पुरस्कार मिला था.

बायोडाटा के लिए पत्र प्राप्त करने वाले 12 में से एक प्रोफेसर ने इसे ‘हैरान करने वाला’ बताया. प्रोफेसर ने नाम न छापने की गुजारिश पर कहा, ‘मुझे करीब एक महीने पहले पत्र मिला था. यह पत्र मिलना काफी हैरान करने वाला था, क्योंकि जब मुझे दर्जा दिया गया था तब इसका पत्र मुझे तत्कालीन कुलपति ने दिया था और कहा था कि यह जीवन भर के लिए दिया गया है. हालांकि मैंने इस पत्र का जवाब दे दिया है.’

उन्होंने कहा, ‘मैंने अन्य स्थानों पर पदों को स्वीकार नहीं किया, क्योंकि मेरे पास यहां पद है. यह मानद पद है और इसके साथ आर्थिक लाभ नहीं जुड़े हैं.’

जवाहरलाल नेहरू शिक्षक संघ (जेएनयूटीए) ने बीते एक सितंबर को कहा था कि जेएनयू प्रशासन का 87 साल की रोमिला थापर से बायोडाटा मांगने का फैसला राजनीति से प्रेरित है.

कांग्रेस नेता शशि थरूर ने भी इस कदम की आलोचना की है.

जेएनयूटीए के बयान के बाद विश्वविद्यालय ने कहा कि वह जेएनयू में प्रोफेसर एमेरिटस के पद पर नियुक्ति के लिए अपने अध्यादेश का पालन कर रहा है.

उसने कहा कि अध्यादेश के मुताबिक, विश्वविद्यालय के लिए यह जरूरी है वह उन सभी को पत्र लिखे जो 75 साल की उम्र पार कर चुके हैं ताकि उनकी उपलब्धता और विश्वविद्यालय के साथ उनके संबंध को जारी रखने की उनकी इच्छा का पता चल सके. यह पत्र सिर्फ उन प्रोफेसर एमेरिटस को लिखे गए हैं जो इस श्रेणी में आते हैं.

विश्वविद्यालय ने स्पष्ट किया कि उसने यह पत्र किसी की सेवा को खत्म करने के लिए नहीं बल्कि विश्वविद्यालय की सर्वोच्च वैधानिक निकाय कार्यकारी परिषद द्वारा समीक्षा करने की जानकारी देने के लिए लिखा है और ऐसा अन्य प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों जैसे एमआईटी और प्रिसंटन विश्वविद्यालय में भी होता है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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