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Friday, 27 September 2019

मरडु फ्लैट्स: कोर्ट ने 138 दिन में गिराने और मकान मालिकों को 25-25 लाख मुआवजा देने का निर्देश दिया

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की ये राशि बिल्डरों और प्रमोटरों से वसूली जा सकती है. इसके अलावा अवैध इमारतों के निर्माण में शामिल बिल्डरों और प्रमोटरों की संपत्तियां जब्त करने का आदेश भी दिया गया.

(फोटो: पीटीआई)

(फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार को आदेश दिया कि कोच्चि के तटीय क्षेत्र पर बने मरडु फ्लैटों को केरल सरकार द्वारा दी गई समय सीमा के अनुसार 138 दिनों में गिरा दिया जाए.

न्यायालय ने हर प्रभावित मरडु फ्लैट मालिक को चार सप्ताह में अंतरिम मुआवजे के तौर पर 25-25 लाख रुपए राज्य सरकार द्वारा दिए जाने का भी आदेश दिया. कोर्ट ने कहा कि मुआवजे की ये राशि बिल्डरों और प्रमोटरों से वसूली जा सकती है.

राज्य सरकार ने आज अदालत में एक हलफनामा दायर कहा कि इस बिल्डिंग को गिराने की पूरी प्रक्रिया 138 दिनों में पूरी कर ली जाएगी. इसमें से 90 दिन ब्लिडिंग को गिराने में लगेंगे और बाकी दिन मलबा हटाने में लगेगा.

इमारत गिराए जाने की निगरानी और कुल मुआवजे का मूल्यांकन करने के लिए न्यायालय ने हाईकोर्ट के किसी सेवानिवृत्त न्यायाधीश की एक सदस्यीय समिति गठित करने का आदेश दिया.

जस्टिस अरुण मिश्रा और जस्टिस एस. रविंद्र भट की पीठ ने कोच्चि के तटीय जोन इलाकों में अवैध इमारतों के निर्माण में शामिल बिल्डरों और प्रमोटरों की संपत्तियां जब्त करने का आदेश दिया.

पीठ ने कहा कि सरकार अवैध रूप से इमारत बनाने वाले बिल्डरों और प्रमोटरों से अंतरिम मुआवजा राशि वसूल करने पर विचार कर सकती है. इस मामले की अगली सुनवाई 25 अक्टूबर को होगी.

एर्नाकुलम के मरडु नगरपालिका में तटीय विनियमन क्षेत्र (सीआरजेड यानी कि कोस्टल रेगुलेशन जोन) मानदंडों का उल्लंघन कर बनाए गए चार अपार्टमेंट कॉम्प्लेक्स में पिछले तीन दिनों से बिना बिजली नहीं है. पानी की आपूर्ति में भी कटौती की गई है.

इस मामले की सुनवाई के दौरान शुक्रवार को हालांकि केरल के मुख्य सचिव टाम जोस न्यायालय में मौजूद थे, लेकिन पीठ ने कहा कि अब 25 अक्टूबर को सुनवाई के दौरान उनकी उपस्थिति जरूरी नहीं होगी.

केरल सरकार की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता हरीश साल्वे ने पीठ को सूचित किया कि इन चारों इमारतों की बिजली और पानी की आपूर्ति बृहस्पतिवार को बंद कर दी गई है.

शीर्ष अदालत ने कहा कि इन इमारतों को गिराने में अब और विलंब की कोई वजह नहीं होनी चाहिए. न्यायालय ने इस संबंध मे फरीदाबाद में कांत एन्क्लेव का उदाहरण दिया जहां गैरकानूनी निर्माण गिराए गए हैं और ऐसे निर्माण के लिए जिम्मेदार लोगों से धन वसूलने की रूपरेखा तैयार की जा चुकी है.

पीठ ने स्पष्ट किया कि न्यायालय का मुख्य सरोकार यह था कि इकोलॉजिकली संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में किसी प्रकार का निर्माण नहीं होना चाहिए और यह किसी व्यक्ति विशेष से संबंधित सवाल नहीं था.

साल्वे जब इन इमारतों को गिराने की कवायद की बारीकियों के बारे में कह रहे थे तो पीठ ने टिप्पणी की, ‘यदि आप यह नहीं कर सकते हैं तो हम इसके लिए किसी बाहरी एजेंसी की सहायता देने के लिए सोचेंगे.’

साल्वे ने कहा कि इन इमारतों को विस्फोट के जरिये ही गिराने की आवश्यकता है और इस काम को करने के लिए 11 अक्टूबर तक विशेष दक्षता प्राप्त एजेंसी की नियुक्ति की जाएगी.

शीर्ष अदालत ने अधिसूचित तटीय क्षेत्र में निर्मित इन इमारतों को एक महीने के भीतर वहां से हटाने का आठ मई को आदेश दिया था.

न्यायालय ने तीन सदस्यीय समिति की रिपोर्ट का संज्ञान लेने के बाद यह आदेश दिया था. समिति ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि पहले से ही अधिसूचित तटीय
विनियमन क्षेत्र में इन इमारतों का निर्माण किया गया है जहां किसी भी प्रकार का निर्माण प्रतिबंधित हैं.

इससे पहले न्यायालय ने इन इमारतों को गिराने के आदेश के खिलाफ इलाके के निवासियों का आवेदन अस्वीकार कर दिया था और अवकाशकालीन पीठ द्वारा इन इमारतों को गिराने पर छह सप्ताह के लिए रोक लगाये जाने पर कड़ा रुख अपनाया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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