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Thursday, 26 September 2019

राकेश अस्थाना मामले की जांच का नेतृत्व कर रहे सीबीआई अधिकारी ने मांगी स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति

सीबीआई के पूर्व विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार मामले के जांच अधिकारी सतीश डागर ने ऐसे समय में स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति की मांग की है, जब बीते 31 अगस्त को दिल्ली हाईकोर्ट ने इस मामले की जांच चार महीने में पूरी करने का आदेश दिया था.

New Delhi: Central Bureau of Investigation (CBI) logo at CBI HQ, in New Delhi, Thursday, June 20, 2019. (PTI Photo/Ravi Choudhary)(PTI6_20_2019_000058B)

केंद्रीय जांच ब्यूरो (सीबीआई) मुख्यालय. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्रीय जांच एजेंसी (सीबीआई) के पूर्व विशेष निदेशक राकेश अस्थाना के खिलाफ कथित भ्रष्टाचार मामले की जांच करने वाले जांच अधिकारी (आईओ) ने अपनी सेवा से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति (वीआरएस) मांगी है.

इंडियन एक्सप्रेस के अनुसार, 19 अगस्त को लिखे गए एक पत्र में पुलिस अधीक्षक (सीबीआई) सतीश डागर ने केंद्रीय सिविल सेवा पेंशन नियम 1972 के नियम 48 के तहत 1 दिसंबर, 2019 से स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए अनुरोध किया. नियम के तहत स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति के लिए आवेदन करने वाले अधिकारियों को कम से कम तीन महीने का नोटिस पीरियड पूरा करना अनिवार्य है.

डागर ने इस सवालों का कोई जवाब नहीं दिया कि उन्होंने स्वैच्छिक सेवानिवृत्ति क्यों मांगी है और क्या उनका अनुरोध स्वीकार कर लिया गया है. हालांकि उन्होंने जिस समय यह कदम उठाया है उससे एजेंसी के अंदर बातें होने लगी हैं.

बता दें कि, बीते 31 मई को दिल्ली हाईकोर्ट ने अस्थाना के मामले की जांच को पूरा करने के लिए चार महीने का समय दिया था.

सीबीआई के प्रवक्ता ने डागर के अनुरोध की स्थिति के बारे में कोई टिप्पणी नहीं की लेकिन पुष्टि की कि उन्होंने व्यक्तिगत आधार पर वीआरएस के लिए आवेदन किया है.

हालांकि, यह साफ नहीं हो सका कि अक्टूबर 2018 में अस्थाना और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ आपराधिक साजिश और भ्रष्टाचार के मामले में डागर जांच अधिकारी बने रहेंगे या नहीं.

बता दें कि, हैदराबाद के व्यवसायी सतीश बाबू सना की शिकायत पर अस्थाना और अन्य के खिलाफ प्राथमिकी दर्ज की गई थी. सना ने आरोप लगाया था कि उन्होंने मीट कारोबारी मोइन अख्तर कुरैशी और अन्य के खिलाफ सीबीआई द्वारा दर्ज एक मामले में राहत पाने के लिए अस्थाना और अन्य को रिश्वत दी थी.

अस्थाना पर आरोप है कि उन्होंने मोईन क़ुरैशी मामले में सतीश बाबू सना से दो बिचौलियों के ज़रिये पांच करोड़ रुपये की रिश्वत मांगी थी.

तत्कालीन सीबीआई निदेशक आलोक वर्मा और उनके डिप्टी अस्थाना ने एक दूसरे पर भ्रष्टाचार का आरोप लगाया था. इसके बाद दोनों को अक्टूबर 2018 में सरकार द्वारा जबरन छुट्टी पर भेज दिया गया था. 10 जनवरी 2019 को वर्मा को सीबीआई निदेशक के पद से हटा दिया गया और एक हफ्ते बाद अस्थाना को नागरिक उड्डयन सुरक्षा ब्यूरो में स्थानांतरित कर दिया गया.

डागर को पिछले साल 24 अक्टूबर को अस्थाना के खिलाफ आरोपों की जांच की जिम्मेदारी सौंपी गई थी. उन्हें यह जिम्मेदारी एम. नागेश्वर राव ने दी थी, जिन्होंने वर्मा को छुट्टी पर भेजे जाने के बाद सीबीआई निदेशक के रूप में कार्यभार संभाला था. डागर ने एके बस्सी की जगह ली थी जिन्हें तत्काल प्रभाव से सार्वजनिक हित में पोर्ट ब्लेयर भेज दिया गया था.

इसके बाद बस्सी ने सुप्रीम कोर्ट में एक याचिका लगाते हुए अपने स्थानांतरण को चुनौती दी थी और दावा किया था कि एजेंसी अस्थाना और अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के खिलाफ मौजूद सबूतों को नष्ट करने का प्रयास कर रही है.

अस्थाना मामले का जांच अधिकारी बनने के तुरंत बाद डागर की सीबीआई टीम ने पिछली टीम के तहत जांच की जब्ती रिपोर्ट में गड़बड़ियों को स्वीकार किया था.

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