दिल्ली की आम जनता की उम्मीदों पर कितने खरे उतरे मोहल्ला क्लीनिक? - Badhata Rajasthan - नई सोच नई रफ़्तार

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Monday, 30 September 2019

दिल्ली की आम जनता की उम्मीदों पर कितने खरे उतरे मोहल्ला क्लीनिक?

ग्राउंड रिपोर्ट: स्वास्थ्य सेवाओं को जन सुलभ बनाने के उद्देश्य से 2016 में दिल्ली सरकार ने मोहल्ला क्लीनिक की शुरुआत की थी. सरकार का वादा एक हज़ार क्लीनिक खोलने का था, लेकिन फिलहाल दिल्ली के विभिन्न क्षेत्रों में ऐसे 210 क्लीनिक काम कर रहे हैं.

Mohalla Clinic Delhi The Wire

पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज का मोहल्ला क्लीनिक. (सभी फोटो: संतोषी मरकाम)

यूं तो पूर्वी दिल्ली के पटपड़गंज में मोहल्ला क्लीनिक का पता लगाना मुश्किल नहीं है, पर ऑटो या कैब से वहां तक पहुंचना नामुमकिन है. मोहल्ला क्लीनिक वाली गली इतनी संकरी है कि उसमें एक दुपहिया वाहन के सिवा कोई भी दूसरा वाहन दाखिल नहीं हो सकता.

यहां तक कि किसी गंभीर बीमारी से परेशान मरीज, जो चल-फिर नहीं सकता, रिक्शे में बैठकर जाना चाहे तो भी जा नहीं सकेगा. पटपड़गंज पोस्ट ऑफिस से कुछ कदम आगे चलने के बाद बाईं ओर आने वाली सड़क में दाखिल होते ही सबसे पहले एक बहुत बड़ा कूड़े का ढेर दिखेगा. जब वहां पहुंचे गई तो कुछ कुत्ते, सुअर और मुरगे उस पर चढ़कर कूड़े को इधर-उधर बिखेरते हुए अपना चारा तलाश रहे थे.

वहां असहनीय बदबू फैली हुई थी. कूड़ा उठाकर ले जाने वाले कब आएंगे, रोज़ आते भी हैं या नहीं, किसी को नहीं पता. इस ढेर के ठीक बगल से दाएं तरफ मुड़कर एक पतली-सी गली अंदर जाती है. उस गली में एक तरफ एक खुली नाली बह रही थी.

यह सुबह के करीब 11 बजे का वक्त था और गली के मुहाने पर ही एक बुजुर्ग ठीक उस नाली के ऊपर चारपाई बिछाकर लेटे हुए थे. मुंह को अपने घर के बंद दरवाज़े की ओर करके वो ऐसे सो रहे थे मानों फिज़ा में फैली बदबू से उन्हें कोई लेना-देना ही न हो.

इसी गली में कुछ चलने के बाद बाईं ओर आता है पटपड़गंज का मोहल्ला क्लीनिक जो फिलहाल दिल्ली में चल रहे 210 मोहल्ला क्लीनिकों में से एक है.

2016 में दिल्ली की आम आदमी पार्टी (आप) सरकार ने आम जनता को सुलभ स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के उद्देश्य से 1,000 मोहल्ला क्लीनिक खोलने का वादा किया था. आंकड़े बताते हैं कि फिलहाल तो सरकार उनके लक्ष्य से काफी पीछे चल रही है.

इस योजना के तहत हर 5 किलोमीटर के दायरे में 10 से 15 हज़ार की आबादी को कवर करते हुए एक मोहल्ला क्लीनिक खोला जाना था. हर मोहल्ला क्लीनिक में एक डॉक्टर, एक फार्मासिस्ट, एक क्लीनिक असिस्टेंट होते हैं, जो मरीज़ों को देखने और आवश्यक टेस्ट करने के अलावा दवाइयां भी देते हैं. डॉक्टर का परामर्श, टेस्ट और दवाइयां – सभी मुफ्त में दिए जाते हैं.

मोहल्ला क्लीनिक की परिकल्पना आर्थिक रूप से कमजोर वर्ग, खासकर जो झुग्गी बस्तियों में रहते हैं और जिनकी स्वास्थ्य सेवाओं के लिए पैसा खर्च करने की क्षमता नहीं है, उनको ध्यान में रखते हुए की गई थी. लेकिन सवाल उठता है कि सरकार ने झुग्गी-बस्तियों में रहने वाले लोगों के लिए मोहल्ला क्लीनिक तो खोल दिया है, लेकिन उन्हें गंदगी की समस्या से कैसे निजात दिलाएगी, जो वहां फैलने वाली बीमारियों की असली जड़ है.

हमने पटपड़गंज के अलावा पूर्वी दिल्ली के जितने भी मोहल्ला क्लीनिकों का दौरा किया, ज्यादातर मरीज़ गंदगी से फैलने वाली बीमारियों से ग्रस्त दिखे. जहां भी मोहल्ला क्लीनिक है, उसके चारों तरफ जगह-जगह कचरे का ढेर, खुली गंदी नालियां, आवारा पशु और उन्हीं के बीच रहने के लिए मजबूर लोग दिखे.

झुग्गियों के आसपास गंदगी (फोटो: संतोषी मरकाम)

झुग्गियों के आसपास गंदगी

चूंकि यह बताया जा रहा था कि पटपड़गंज मोहल्ला क्लीनिक में साफ-सफाई का जिम्मा ‘निर्मल’ नामक एक एनजीओ पर है, इसलिए वहां क्लीनिक के अंदर और उसके परिसर में हालत कुछ बेहतर ही दिखी, लेकिन कुछ अन्य मोहल्ला क्लीनिकों में तो चारों तरफ गंदगी फैली हुई थी.

हमने पूर्वी दिल्ली के त्रिलोकपुरी स्थित मोहल्ला क्लीनिक में जाकर यह जानने की कोशिश की कि वहां लोगों को किस तरह की स्वास्थ्य सुविधाएं मिल रही हैं. इस क्लीनिक में लोगों को दवाइयों और डॉक्टरों से कोई शिकायत नहीं थी, लेकिन जगह छोटी होने की वजह से उन्हें तकलीफ हो रही थी.

लोगों का कहना था कि वहां अक्सर भीड़ काफी ज़्यादा होती है, इसलिए खड़े रहने के लिए भी जगह नहीं मिलती है. भीड़ की वजह से किसी भी तरह की संक्रामक बीमारियों के फैलने का खतरा बना रहता है.

यह क्लीनिक एक छोटे-से घर में बना है, जिसमें बहुत ही छोटे-छोटे दो कमरे हैं, जिसमें से एक में मरीज आकर बैठते हैं और दूसरे कमरे में डॉक्टर और स्टाफ.

यहां आए लोगों ने बताया, ‘रोज अंदर जगह नहीं होती इसलिए बाहर गली में खड़े रहकर अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है.’ यह गली भी बहुत संकरी है और अगल-बगल से खुली गंदी नालियां, फैली बदबू और भिनभिना रही मक्खियां बीमारियों की वजह बन सकती हैं.

इस बारे में पूछने पर इस क्लीनिक के डॉक्टर योगेश कुमार ने बताया, ‘अभी यह क्लीनिक किराये के मकान में चल रहा है. पास में ही एक पोटाकेबिन बन रही है, जल्द ही इसे वहां स्थानांतरित कर दिया जाएगा.’ रिपोर्ट के प्रकाशन तक क्लीनिक को पोटाकेबिन में स्थानांतरित कर दिया गया है, यह जानकारी डॉ. योगेश कुमार ने फोन पर दी.

इस मोहल्ला क्लीनिक में इलाज कराने के लिए आई राजकुमारी जो कि आया का काम करती हैं. उन्हें थॉयराइड है और पिछले तीन साल से वहां इलाज करा रही है. उन्होंने बताया कि उनकी मासिक आमदनी पांच-छह हजार रुपये है, ऐसे में मुफ्त में अच्छी दवाइयां मिलने से उन्हें काफी राहत मिल रही है.

उन्होंने बताया, ‘हम पहले प्राइवेट अस्पतालों में जाकर इलाज कराते थे. बहुत खर्च होता था, लेकिन जब से यह क्लीनिक शुरू हुआ, यहां इलाज करवा रहे हैं. हर तीन महीने में एक बार आकर थॉयइराड का टेस्ट करा लेती हूं. डॉक्टर दवाइयां दे देते हैं. हमें अब यहां हर किस्म की दवाइयां मिल रही हैं.’

इलाज कराने आई एक और महिला का कहना था कि वे भी इस क्लीनिक में काफी समय से इलाज करा रही हैं. उनके पति किराये पर रिक्शा चलाते हैं और उनके दो बच्चे हैं. उन्होंने बताया, ‘जब मैं पहली बार यहां इलाज कराने आई थी तब मुझे जोड़ों और कमर में दर्द था. इसके अलावा लेडीज़ प्रॉब्लम था, जो यहां से इलाज कराने के बाद ठीक हो गया.’

एक और मरीज़ मुमताज ने बताया कि वह पिछले दो साल से यहां से मधुमेह (शुगर) की दवाइयां ले रही है. उन्होंने कहा, ‘मोहल्ला क्लीनिक के आने से हमें बहुत सुविधा हो रही है.’

मोहल्ला क्लिनिक (फोटो: संतोषी मरकाम)

मोहल्ला क्लीनिक में दवा देती फार्मासिस्ट

मुमताज़ ने बताया कि जब मोहल्ला क्लीनिक नहीं था तब वह लाल बहादुर शास्त्री अस्पताल या अरविंद अस्पताल में जाकर इलाज कराती थीं.

उन्होंने बताया, ‘वहां सिर्फ शुगर का टेस्ट होता है. अगर कुछ दूसरा टेस्ट कराना होता था या कोई बड़ी बीमारी होती थी तो बड़े अस्पताल जाने के लिए कहते थे. लेकिन अब यहां सभी टेस्ट मुफ्त में हो जाते हैं. दवाइयां भी मिल जाती हैं. अगर कभी कोई दवाई नहीं मिलती तो बाहर से ले लेते हैं.’

डॉ. योगेश कुमार मानते हैं कि मोहल्ला क्लीनिक एक अच्छा कॉन्सेप्ट है. वे कहते हैं, ‘इससे मरीज को मुफ्त में स्वास्थ्य सुविधाएं मिलती हैं. ये क्लीनिक सबकी पहुंच में है. बड़े अस्पतालों में जो भीड़ होती थी, उसे कम किया गया है. हमारी दवाइयों और इलाज से मरीज खुश हैं.’

उन्होंने बताया, ‘दिल्ली में मोहल्ला क्लीनिक को ब्रिटेन की नेशनल हेल्थ योजना की तर्ज पर शुरू की गई है. मैं मानता हूं कि ऐसे क्लीनिक पूरे भारत में होने चाहिए. ये क्लीनिक हेल्थ फॉर ऑल के कॉन्सेप्ट को पूरा करते हैं.’

हालांकि वे यह बात मानते हैं कि दिल्ली की आबादी को देखते हुए हजार मोहल्ला क्लीनिक भी कम ही होंगे. वे कहते हैं, ‘पहले डिस्पेंसरी होती थीं,  मरीज आते थे, लेकिन दवाइयां नहीं होती थी, तो उन्हें रेफर किया जाता था, लेकिन मोहल्ला क्लीनिक में सभी दवाइयां मिल जाती हैं.’

हम जितने भी मोहल्ला क्लीनिक में गए, वहां चार लोगों का स्टाफ था. इस पर डॉ. योगेश ने बताया, ‘सरकार ने हमें चार लोगों का स्टाफ दिया है, जिसमें एक डॉक्टर, एमसीए (मोहल्ला क्लीनिक असिस्टेंट), फॉर्मेसिस्ट और चौथा मल्टीटॉस्क वर्कर.’ डॉ. योगेश के मुताबिक एक क्लीनिक के लिए इतना स्टाफ काफी है.

क्लीनिक के सामने से गुज़र रहे एक रिक्शावाले से जब यह पूछा कि क्या वे मोहल्ला क्लीनिक आते हैं, तो उन्होंने बताया कि उन्हें मोहल्ला क्लीनिक से दवाई नहीं मिलती क्योंकि उनका आधार कार्ड नहीं है. उत्तर प्रदेश के बदायूं से आने वाले वह व्यक्ति पिछले 15 सालों से दिल्ली में रह रहे हैं.

लेकिन मोहल्ला क्लीनिक में बिना आधार कार्ड के इलाज न होने की बात को कल्याणपुरी मोहल्ला क्लीनिक की असिस्टेंट रीना खारिज़ करती हैं. उन्होंने बताया, ‘झुग्गियों में रहने वाले बहुत से लोगों के पास आधारकार्ड नहीं होता है फिर भी हम उनका भी इलाज करते हैं. उनके स्लिप में उनके निवास स्थान- झुग्गी या मकान का नंबर डाल देते हैं.’

मोहल्ला क्लीनिक में आधार कार्ड की अनिवार्यता पर जब डॉ. योगेश कुमार से सवाल किया तो उन्होंने बताया कि सरकारी नियम के मुताबिक आधार कार्ड का होना अनिवार्य नहीं है. इसके लिए सरकार द्वारा जारी कोई भी पहचान पत्र, जिसमें फोटो लगा हो, जैसे कि मतदाता पहचान पत्र, राशन कार्ड, पैन कार्ड लाया जा सकता है.

हालांकि कुछ लोग ऐसे भी थे जो मोहल्ला क्लीनिक में स्टाफ के कामकाज के तरीकों से खुश नहीं थे. किराने की दुकान चलाने वाले विशाल भगत इनमें से एक हैं. उनका कहना है कि क्लीनिक का स्टाफ सक्षम नहीं है और दवाइयां ठीक से काम नहीं करतीं.

मोहल्ला क्लीनिकों को चलाने में क्या चुनौतियां हैं, इस सवाल पर कल्याणपुरी के मोहल्ला क्लीनिक की डॉ. प्रशंसा गरेवाल का कहना है, ‘शुरूआत में चुनौतियां ज़्यादा थीं, पहले क्लीनिक सिर्फ एक डॉक्टर के भरोसे चल रहे थे. लेकिन सरकार अब स्टाफ को बढ़ा रही ही है. स्थिति अब पहले से बेहतर है.’

डॉ. प्रशंसा का कहना है कि मोहल्ला क्लीनिक के खुलने से लोगों को सुविधा हो रही है. वे कहती हैं, ‘जो उम्रदराज़ हैं, जिन्हें ज्यादा समय तक खड़े रहना मुश्किल होता है, ज्यादा चलने में परेशानी होती है, ऐसे लोग मोहल्ला क्लीनिक ही आना पसंद करते हैं क्योंकि ये उनके घरों के पास होते हैं.’

उन्होंने बताया कि सरकार आगे चलकर पॉली क्लीनिक खोलने की योजना भी बनारही है, जहां मरीज़ों को मुफ्त अल्ट्रासाउंड, एक्स-रे जैसी सुविधाएं भी दी जाएंगी.

डॉ. प्रशंसा ने बताया कि मोहल्ला क्लीनिकों में ज्यादातर निम्न आय वर्ग के लोग ही आते हैं, लेकिन यहां जिस तरह का इलाज और दवाइयां दी जा रही हैं उसे देखकर कुछ मध्यम वर्ग के लोग भी आने लगे हैं. वे बताती हैं, ‘ये क्लीनिक ख़ासतौर पर झुग्गियों में रहने वालों के लिए ही खोले गए हैं, लेकिन कई बार इसका फायदा दो-दो गाड़ियां रखने वाले और जिनको पैसों की कोई दिक्कत नहीं है, ऐसे लोग भी उठा रहे हैं.’

उन्होंने बताया कि मोहल्ला क्लीनिकों में रोज 100 से ज़्यादा मरीज इलाज के लिए आते हैं. क्लीनिक सुबह 8 बजे से दोपहर 2 बजे तक खुला रहता है. जिन मोहल्ला क्लीनिकों में ज्यादा मरीज आ रहे हैं, वहां अब दो शिफ्ट लग रही है.

डॉ. प्रशंसा ने बताया कि इन क्लीनिकों में आने वाला हर तीसरा मरीज किसी न किसी त्वचा रोग से पीड़ित होता है. इसके अलावा दस्त, पेट की बीमारियां और मौसमी बीमारियों से पीड़ित लोग भी आते हैं.

वे मानती हैं कि इसका मुख्य कारण गंदगी है क्योंकि झुग्गी-झोंपड़ियों में साफ-सफाई नहीं होती. कई बार पीने के पानी में कहीं न कहीं सीवर का पानी मिल जाता है. साथ ही, घरों के आसपास भी साफ-सफाई न के बराबर ही होती है.

मोहल्ला क्लिनिक (फोटो: संतोषी मरकाम)

एक और खास पहलू यह है कि मोहल्ला क्लीनिकों में आने वाले मरीजों में पुरुषों की तुलना में महिलाओं की संख्या काफी ज़्यादा है. कल्याणपुरी के मोहल्ला क्लीनिक में असिस्टेंट के रूप में काम कर रही रीना का कहना है कि उनके मरीजों में साफ-सफाई के अभाव से उत्पन्न होने वाली बीमारियां ही ज्यादा हैं.

वे बताती हैं, ‘कई महिलाएं वजाइनल इंफेक्शन से पीड़ित होती हैं क्योंकि वे झुग्गियों में रहती हैं जहां साफ-सफाई का अभाव रहता है. उन्हें पता भी नहीं होता कि उन्हें काउंसिलिंग की ज़रूरत है. इसके अलावा इन महिलाओं में शुगर और थॉयराइड के मरीज भी ज्यादा हैं.’

कल्याणपुरी मोहल्ला क्लीनिक से करीब 100 मीटर दूर स्थित एक झुग्गी बस्ती में जाकर देखा तो समझ में आया कि रीना की बातों में कितना वज़न है. वहां की गलियों में दोनों ओर खुली नालियां थीं. हर तरफ गंदगी फैली थी. हर तरफ मक्खियां और मच्छर थे.

छोटी-छोटी झुग्गियों में पूरे परिवार के साथ बहुत सारे लोग रह रहे थे. छोटे बच्चे गलियों में उसी गंदगी के बीच खेल रहे थे. उनसे बात की तो लगभग सभी ने यही कहा कि मोहल्ला क्लीनिक से उन्हें ठीक से दवाइयां मिल जाती हैं, लेकिन सवाल उठता है कि क्या इन लोगों के रहने की परिस्थितियां यहां के लोगों को कभी बीमारियों के खतरे से उबरने देंगे?

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