जेएनयू छात्रसंघ चुनाव: कैंपस, कश्मीर और आर्थिक मंदी की चर्चा - Badhata Rajasthan - नई सोच नई रफ़्तार

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Wednesday, 4 September 2019

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव: कैंपस, कश्मीर और आर्थिक मंदी की चर्चा

जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में छह सितंबर को छात्रसंघ चुनाव है. ‘लेफ्ट यूनिटी’ के तहत एसएफआई, डीएसएफ, आइसा और एआईएसएफ, बापसा के साथ फ्रैटर्निटी और एनएसयूआई के साथ एमएसएफ चुनाव मैदान में हैं. एबीवीपी और छात्र-राजद बिना किसी गठबंधन के चुनाव लड़ रहे हैं.

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव के तहत छात्र कैंपस में मशाल जुलूस भी निकाल रहे हैं.

जेएनयू छात्रसंघ चुनाव के तहत छात्र कैंपस में मशाल जुलूस भी निकाल रहे हैं.

नई दिल्ली स्थित जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्रसंघ चुनाव छह सितंबर को होने जा रहा है. देश के अधिकतर छात्रसंघ चुनावों के विपरीत यहां का चुनाव धनबल और बाहुबल का न होकर विचारधाराओं पर लड़ा जाता है.

चुनाव प्रक्रिया भी बड़ी रोचक होती है. छात्रों द्वारा गठित चुनाव आयोग होता है जो पूरी प्रक्रिया बिना प्रशासन के हस्तक्षेप के पूरी करता है. चुनाव पूर्व संगठन, स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर पर आम छात्र सभाएं होती हैं, जिसमें भाषण, बहस और सवाल-जवाब होते है.

हर संगठन अपना मशाल जुलूस निकालता है और सबसे महत्वपूर्ण होती है चुनाव के दो रात पहले की प्रेसिडेंशियल डिबेट जिसमें छात्रसंघ अध्यक्ष पद के सभी उम्मीदवारों के भाषण-बहस और सवाल-जवाब पूरी रात चलते रहते है.

आपातकाल के दौरान की लड़ाई में इंदिरा गांधी को परिसर में नहीं घुसने देने से लेकर बतौर प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को आने पर काले झंडे दिखाने जैसे किस्से इसके इतिहास में भरे पड़े है.

जेएनयू छात्रसंघ में वामपंथी संगठनों का दबदबा रहा है, जिससे सीताराम येचुरी, प्रकाश करात, बृंदा करात, बीजू कृष्णन, चंद्रशेखर, कविता कृष्णन, कन्हैया कुमार और संदीप सिंह जैसे नेता और सामाजिक कार्यकर्ता भी निकले है तो एक बार एबीवीपी के संदीप महापात्रा ने भी वामपंथ के इस गढ़ में अध्यक्ष बनकर चौकाया है.

लगभग सभी राजनीतिक दलों में यहां से निकले छात्रनेता अपनी अलग तरह की मौजूदगी रखते है. बहुत सारे छात्रनेता जाने-माने प्रशासक, शिक्षक और पत्रकार भी बने है.

‘लेफ्ट यूनिटी’ हावी है तीन साल से, इस बार भी हैं साथ

हालांकि वामपंथी संगठनों की जीत का अपना इतिहास रहा है लेकिन फरवरी 2016 के कथित देशद्रोही नारे लगाने के प्रकरण के बाद से पिछले तीन बार से लेफ्ट के संगठन ‘लेफ्ट यूनिटी’ बनाकर साथ में ही चुनाव लड़ रहे हैं और एकतरफ़ा चुनाव भी जीत रहे है.

इस बार भी काफी खींचातानी के बाद अंतिम समय में एसएफआई, डीएसएफ, आइसा और एआईएसएफ ने साथ मिलकर चुनाव लड़ने का फैसला किया है, जिसमें अध्यक्ष पद के लिए एसएफआई (स्टूडेंट्स फेडरेशन ऑफ इंडिया), उपाध्यक्ष के लिए डीएसएफ (डेमोक्रेटिक स्टूडेंट्स फेडरेशन), महासचिव के लिए आइसा (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स एसोसिएशन) और संयुक्त सचिव के लिए एआईएसएफ (ऑल इंडिया स्टूडेंट्स फेडरेशन) के कार्यकर्ता को मैदान में उतारा गया है.

बताया जा रहा है की अध्यक्ष पद के लिए अंतिम समय तक एसएफआई और आइसा के बीच सहमति नहीं बनने के चलते ये देरी हुई और अंत में एसएफआई की कार्यकर्ता और पिछली दो बार से एसआईएस (स्कूल ऑफ इंटरनेशनल स्टडीज) की कन्वीनर रहीं आईशी घोष को ‘लेफ्ट यूनिटी’ की तरफ से उम्मीदवार बनाया गया है.

एमफिल में दूसरे साल की छात्रा आईशी मूल रूप से पश्चिम बंगाल के दुर्गापुर जिले की रहने वाली हैं. अपनी स्कूली शिक्षा अपने गृह जिले से पूरी करने के बाद दिल्ली विश्वविद्यालय के दौलतराम कॉलेज से राजनीति विज्ञान में ऑनर्स और जेएनयू से अंतरराष्ट्रीय संबंधों में एमए की पढ़ाई की है.

लेफ्ट यूनिटी से आईशी घोष, एनएसयूआई से प्रशांत कुमार और छात्र राजद से प्रियंका भारती अध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं. (फोटो साभार: फेसबुक)

लेफ्ट यूनिटी से आईशी घोष, एनएसयूआई से प्रशांत कुमार और छात्र राजद से प्रियंका भारती अध्यक्ष पद की उम्मीदवार हैं. (फोटो साभार: फेसबुक)

आईशी कहती हैं, ‘हेफा (हायर एजुकेशन फंडिंग एजेंसी) लोन लेकर जेएनयू 283 रुपये में शिक्षा के मॉडल को तबाह करने की कोशिश की जा रही है. हमारी लड़ाई इसको बचाने से लेकर इसी मॉडल को इंजीनियरिंग और मैनेजमेंट के पाठ्यक्रमों में भी लागू करवाने की है.’

उत्तर पूर्वी क्षेत्र विकास मंत्रालय से 11 करोड़ रुपये मिलने के बावजूद हॉस्टल नहीं बनाए जाने पर सवाल उठाते हुए और हॉस्टल खोलने की मांग पर वह जोर देती हैं.

बापसा ने फ्रैटर्निटी और एनएसयूआई ने एमएसएफ से किया गठबंधन

आक्रामक बहुजन छात्र राजनीति के लिए पहचाने जाने वाला बापसा (बिरसा-आंबेडकर-फुले स्टूडेंट्स एसोसिएशन) इस बार फ्रैटर्निटी (मुस्लिम छात्रों का एक संगठन) के साथ गठबंधन करके अध्यक्ष और महासचिव पद के लिए दावेदारी कर रहा है, वहीं एनएसयूआई (नेशनल स्टूडेंट्स यूनियन ऑफ इंडिया) भी एमएसएफ (मुस्लिम स्टूडेंट्स फेडरेशन) के साथ मिलकर अध्यक्ष पद के लिए मैदान में है.

बापसा जहां ‘लेफ्ट-राइट धोखा है’ बोलकर खुद को मौका देने की बात करता है वही एनएसयूआई खुद को एबीवीपी से लड़ने के लिए सबसे मजबूत संगठन बताकर अपना दावा पेश कर रहा है.

कानपुर जिले के रहने वाले और नई दिल्ली स्थित हिंदू कॉलेज से स्नातक एनएसयूआई के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार प्रशांत कुमार दर्शनशास्त्र में पीएचडी के छात्र हैं.

प्रशांत जेएनयू में विज्ञान विषय से जड़ी समस्याएं उठाने के साथ खेलों को बढ़ावा देने की बात कहते हैं.

हॉस्टल की कमी, गैर-अंग्रेजी भाषा के छात्रों की समस्याओं के समाधान की बात करते हुए प्रशांत कहते हैं, ‘नई शिक्षा नीति में शिक्षा को बर्बाद करने का मॉडल लाया जा रहा है जिसका हम पुरजोर विरोध करते हैं.’

बापसा के अध्यक्ष पद के उम्मीदवार जितेंद्र सूना मूल रूप से ओडिशा के कालाहांडी के रहने वाले हैं. जेएनयू से इतिहास में एमए और एमफिल करके वह अभी पीएचडी कर रहे हैं.

जितेंद्र बहुजनों की राजनीति करने का दावा करते हुए कहते हैं, ‘हमारा (बहुजन) इतिहास भी हम ही लिखेंगे, हमारी राजनीति अब हम ही करेंगे और हमारा भविष्य भी अब हम ही निश्चित करेंगे न की कोई और हमारा मसीहा बनेगा.’

एबीवीपी और छात्र-राजद अकेले मैदान में

पिछली बार चारों पदों पर दूसरे नंबर पर रही एबीवीपी (अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद) इस बार भी चारों पदों पर अकेले मैदान में है, वही पिछली बार पहली दफा और सिर्फ अध्यक्ष पद के लिए चुनाव लड़ने वाली छात्र-राजद (राष्ट्रीय जनता दल) इस बार अध्यक्ष और उपाध्यक्ष पद पर बिना किसी से गठबंधन किए मैदान में है.

जितेंद्र सूना बापसा और मनीष जांगिड़ एबीवीपी से अध्यक्ष पद के उम्मीदवार है. (फोटो साभार: फेसबुक)

जितेंद्र सूना बापसा और मनीष जांगिड़ एबीवीपी से अध्यक्ष पद के उम्मीदवार हैं. (फोटो साभार: फेसबुक)

छात्र-राजद की अध्यक्ष पद की उम्मीदवार और जर्मन भाषा में एमए की छात्रा प्रियंका भारती पटना के सतुहा से आती हैं. छात्र-राजद द्वारा खुद को उम्मीदवार बनाए जाने को लैंगिक बराबरी का उदहारण बताते हुए प्रियंका सालभर में अपने दल के किए हुए संघर्ष को बताती है.

गठबंधन के प्रयासों पर बापसा और एनएसयूआई को छात्र-राजद की विचारधारा के आसपास मानते हुए प्रियंका कहती हैं कि हमने प्रयास किए थे कि तीनो साथ आए लेकिन बात बन नहीं सकी, इसके लिए आगे भी प्रयास करते रहेंगे.

जयपुर के निवासी और पर्यावरण विज्ञान के शोधार्थी मनीष जांगिड़ को एबीवीपी ने अध्यक्ष पद का प्रत्याशी बनाया है. हमने विभिन्न व्यक्तियों और माध्यमों से उनसे संपर्क के प्रयास किए लेकिन उनसे संपर्क नहीं हो सका.

आपस में और प्रशासन से दोहरी लड़ाई में हैं संगठन

इन चुनावों में एक तरफ जहां आपस में एक लड़ाई में है वही प्रशासन के चुनाव प्रक्रिया में बढ़ते कथित हस्तक्षेप से भी निपटना एक चुनौती बना हुआ है.

स्वच्छ जेएनयू’ के नाम पर पोस्टर्स हटाने से लेकर प्रशासन द्वारा पहले काउंसलर की संख्या बढ़ाए जाने को लिखे पत्र और अब चुनाव लड़ रहे उम्मीदवारों की सालभर की उपस्थति का ब्योरा मांगने जैसे मामलों पर सवाल जेएनयू छात्रसंघ और उसके चुनाव आयोग के साथ-साथ लगभग सभी दलों ने गंभीर आपत्ति दर्ज की है. छात्र संगठन एबीवीपी पर प्रशासन से मिलीभगत का भी आरोप लगाते हैं.

कैंपस में चुनावी हलचल चरम पर

पिछले तीन-चार दिनों से संगठन की आम छात्र सभाएं हो रही हैं और मशाल जुलूस निकाले जा रहे है. अलग-अलग संगठन और विचारधाराओं के नारों से कैम्पस गूंज रहा है जिसका चरम चार तरीख की शाम में होने वाली ‘प्रेसिडेंशियल डिबेट’ में देखने को मिलेगा.

झेलम लॉन में अध्यक्ष पद के सारे उम्मीदवार कैंपस से लेकर देश-विदेश के मुद्दों, अपनी विचारधारा-संगठन के पक्ष में, प्रतिद्वंद्वियों के विपक्ष में एक मंच पर भाषण देंगे, गंभीर बहस करेंगे और सवालों के जवाब देंगे.

कश्मीर और मंदी रहेंगे बड़े मुद्दे

इस बार के चुनाव में सालभर के कैम्पस से जुड़े मुद्दों, लैंगिक न्याय, सामाजिक न्याय, सांप्रदायिकता, मॉब लिंचिंग जैसे मुद्दों के साथ-साथ सबसे प्रमुखता से कश्मीर से 370 और 35ए हटाने और आर्थिक मंदी को उठाया जा रहा है.

‘लेफ्ट यूनिटी’ जहां सालभर और पिछले सालों में किए गए अपने संघर्ष को गिनाते हुए कैंपस के मुद्दों और अन्य मुद्दों के साथ कश्मीर के मामले को लेकर सरकार, बीजेपी, एबीवीपी और आरएसएस को घेर रही है. संगठन आर्थिक मंदी पर भी मुखर नजर आ रहा है.

बापसा भी अपने बहुजन मुद्दों के साथ-साथ कश्मीर मुद्दे को प्रमुखता से उठा रहा है वहीं एनएसयूआई इसे गंभीरता से उठाकर कांग्रेस के स्टैंड को मजबूत कर रहा है. दूसरी तरफ एबीवीपी कश्मीर मुद्दे को अपनी उपलब्धि की तरह पेश कर रहा है.

लेकिन परिणामों में ज्यादा बदलाव की उम्मीद कम

जानकारों का मानना है कि स्कूल स्तर पर काउंसलर की संख्या में बढ़ोतरी लेफ्ट के अलावा अन्य संगठनों के काउंसलर की संख्या में कुछ फर्क लाएगा. साथ ही कुछ पदों के बंटवारे में बदलाव हुआ है, कुछ नए गठबंधन भी बने है, लेकिन सेंट्रल पैनल के अंतिम परिणामों में ज्यादा बदलाव की उम्मीद कम ही है क्योंकि ‘लेफ्ट यूनिटी’ में चारों संगठन मिलकर इतना वोट बैंक बना लेते हैं कि दूसरे नंबर पर आने वाले दल या गठबंधन आधे से भी कम वोट तक सीमित रह जाते है.

हालांकि किसी भी तरह की संभावनाओं से भी इनकार नहीं किया जा सकता, क्योंकि 2015-16 में अकेले एआईएसएफ जैसे तुलनात्मक रूप से छोटे संगठन से लड़कर कन्हैया कुमार भी जीते हैं. उससे कुछ साल पहले एसएफआई से टूटकर बने जेएनयू-एसएफआई, जो की बाद में डीएसएफ बनी, से लेनिन भी छात्रसंघ अध्यक्ष बने हैं.

(महेश चौधरी स्वतंत्र पत्रकार हैं और खुशबू शर्मा जेएनयू में राजनीति विज्ञान की छात्रा हैं.)

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