मैं मोहनदास करमचंद गांधी राष्ट्रपिता के पद से त्यागपत्र देता हूं - Badhata Rajasthan - नई सोच नई रफ़्तार

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Wednesday, 2 October 2019

मैं मोहनदास करमचंद गांधी राष्ट्रपिता के पद से त्यागपत्र देता हूं

आज राष्ट्र को वास्तविक पिता की ज़रूरत है, मेरे जैसे सिर्फ नाम के पिता से काम नहीं चलने वाला है. आज बड़े-बड़े फ़ैसले हो रहे हैं. छप्पन इंच की छाती दिखानी पड़ रही है. ऐसा पिता जो पब्लिक को कभी थप्पड़ दिखाए तो कभी लॉलीपॉप, पर अपने तय किए रास्ते पर ही राष्ट्र को ठेलता जाए. मैं ऐसे राष्ट्रपिता की ज़रूरत कैसे पूरी कर सकता हूं?

The Prime Minister, Shri Narendra Modi offers flower petals at Mahatma Gandhi bust, at the Sabarmati Ashram, in Ahmedabad, Gujarat on June 29, 2017.

साबरमती आश्रम में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो: पीटीआई)

प्यारे देशवासी भाइयों और बहनों,

आज मैं डेढ़ सौ वर्ष का हो गया हूं. जीवेत वर्षम् शतं की कामना से भी डेढ़ गुना. प्रिय नाथूराम की गोली खाने के बाद भी बहत्तर साल और. यह सब आपके प्यार और उदारता का ही चमत्कार है. इसके लिए मैं आपका कितना कृतज्ञ हूं, इसे बता नहीं सकता हूं.

लेकिन, इसीलिए मैं एक पल को भी यह नहीं भूल सकता हूं कि आप के हित में क्या है? और जो मुझे आपके हित में लगता है, उसके लिए बोलने से मुझे कोई ताकत रोक नहीं सकती है, न इस दुनिया की और न उस दुनिया की.

मेरी जिद कितनी मशहूर है, वह तो आप जानते ही हैं. तो मैं तो अपनी तरफ से आपके हित की बात मानकर ही मांग रहा हूं, पर आप चाहें तो मेरी जिद मान लीजिए. जन्मदिन डेढ़ सौवां भी हो तो क्या, जन्म के दिन तो इंसान बच्चा ही होता है. आप चाहे इसे मेरा बालहठ ही मान लीजिए. पर मान लीजिए और तत्काल प्रभाव से राष्ट्रपिता के पद से मेरा त्यागपत्र स्वीकार कर लीजिए.

आज से, बस अभी से, न राष्ट्रपिता, न बापू. फादर ऑफ इंडिया तो हर्गिज नहीं. मैं तो कहूंगा, गांधी के आगे जी लगाने की भी जरूरत क्या है? मां-बाप ने नाम दिया था, मोहनदास. लेना हो तो वही नाम लें, हालांकि अब उसकी भी जरूरत क्यों पड़ने लगी? नाम ही नहीं होगा, तो गांधी-नेहरू खानदान के चक्कर में बदनाम भी तो नहीं होगा. अब कम से कम राष्ट्रपिता नहीं, प्लीज!

अब राष्ट्रपिता नहीं से आप यह मत समझिएगा कि मैं यह कह रहा हूं कि अब से कोई राष्ट्रपिता ही नहीं हो. मैं राष्ट्रपिता हो गया बस, इसके बाद कोई राष्ट्रपिता ही नहीं हो, ऐसा मेरा मत हर्गिज नहीं है. मैं अपने देश और देशवासियों को अब इतना तो जानता ही हूं कि यह समझने में गलती नहीं कर सकता कि आज राष्ट्र को पिता की पहले से कम नहीं ज्यादा जरूरत है.

राष्ट्र को आज पिता की ही सबसे ज्यादा जरूरत है. पहले के टाइम में तो फिर भी चाचा, ताऊ, मामा, मौसी, ताई, भगिनी, भाई वगैरह-वगैरह भी होते थे और पिता से इतना काम नहीं पड़ता, पर एकल परिवार के इस जमाने में तो एक पिता की और सिर्फ पिता की ही जरूरत है.

सच पूछिए तो आज वास्तविक पिता की जरूरत है. मेरे जैसे सिर्फ नाम के पिता से काम नहीं चलने वाला है. आज बड़े-बड़े फैसले होने और हो रहे हैं. छप्पन इंच की छाती दिखानी पड़ रही है. जनता के हित के लिए उसे ऐसे रास्तों पर ले जाना पड़ रहा है, जिन पर चलने में उसे अपना हित दिखाई ही नहीं दे रहा हो.

नोटबंदी के लिए पूरे देश को लाइन में खड़ा करना पड़ता है. कश्मीर के भले के लिए कश्मीर को खुली जेल बनाना पड़ता है. किसानों को ज्यादा आत्महत्या करने से बचाने के लिए, उनकी आत्महत्या के आंकड़ों को, औरतों के खिलाफ अपराधों को कम करने के लिए उनके खिलाफ अपराध के आंकड़ों को, नौजवानों की हिम्मत टूटने न देने के लिए बेरोजगारी के आंकड़ों आदि को उनसे ही छुपाना पड़ता है.

और हर हाल में राष्ट्र को महानता के रास्ते पर बढ़ाते रहने के लिए, उसकी आंखों पर बैल की आंखों पर बांधने वाले चश्मे की तरह पाकिस्तान/कश्मीर/मुसलमान/घुसपैठिया/मंदिर/गाय वगैरह का चश्मा लगाए रखना होता है. पब्लिक को नाराज करने की भी परवाह न करके उसके हित में इतना सब तो कोई पिता ही कर सकता है.

ऐसा पिता जो पब्लिक को कभी थप्पड़ दिखाए तो कभी लॉलीपॉप दिलाए, पर अपने तय किए रास्ते पर ही राष्ट्र को ठेलता जाए. मैं ऐसे राष्ट्रपिता की जरूरत कैसे पूरी कर सकता हूं? ऐसे राष्ट्र के लिए मेरे जैसा पिता किस काम का?

मैं तो जिद पकड़ भी लूं तो अपने अनशन से लोगों को पिघलाने के सिवा मुझे कुछ नहीं आता है. मुझे अपने प्यारे राष्ट्र के पांवों में बेड़ी बनकर नहीं पड़े रहना है. मेहरबानी करके राष्ट्रपिता के पद से मेरा इस्तीफा फौरन स्वीकार करें. आज और अभी.

मुझे पता है कि आप कानूनी दलीलों की आड़ में मामला टालने की कोशिश करेंगे. कहेंगे कि राष्ट्रपिता का तो कोई पद ही नहीं है, न देश के कानून में और न संविधान में. जैसे शहीद भगत सिंह वगैरह, वैसे ही आप राष्ट्रपिता, बिना किसी लिखत-पढ़त के.

और जो पद ही नहीं है, उससे कैसे तो किसी का इस्तीफा कैसे स्वीकार किया जा सकता है और कैसे किसी की नियुक्ति की जा सकती है? हां! राष्ट्र ही किसी को पिता कहने लगे तो कोई क्या कर सकता है?

वैसे भी राष्ट्र के किसी को पिता कहने से फर्क भी क्या पड़ता है? जन्मदिन, मरण दिन पर माला-वाला चढ़ाने, रास्तों-इमारतों का नाम-वाम रखने या ज्यादा नोटों पर फोटो छापने की ही तो बात है. न राष्ट्र के लिए पिता के रास्ते पर चलने की कोई मजबूरी होती है और न हर चीज के लिए पिता से पूछने की जरूरत होती है.

चाचा-ताऊ वाले जमाने को छोड़ दें तो बहत्तर साल में और किसी ने, किसी चीज के लिए पूछा था? फिर चलने दीजिए जैसा चल रहा है. राष्ट्र की खुशी के लिए राष्ट्रपिता इतने में क्या खुश भी नहीं रह सकता. चलती गाड़ी में डंडा अड़ाने का क्या फायदा? एंटी-नेशनलों के हौसले क्यों बढ़ाना वगैरह-वगैरह.

पर मैं कोई दलील नहीं सुनूंगा. राष्ट्रपिता के तमगे से अपना पीछा छुड़ाकर रहूंगा. राष्ट्रपिता का आसन खाली करके रहूंगा. अब प्लीज यह मत कहिएगा कि अब ही क्यों? बहत्तर साल बाद ही क्यों? जिस राष्ट्र ने इतने साल से सुननी बंद कर रखी थी, उसका पिता कहलवाने से पीछा छुड़ाने की अब इतनी उतावली क्यों?

झूठ क्यों कहूं, इसमें मेरी भी कुछ कमजोरी रही है. मुझे कभी सिर्फ अपनी चलाना आया ही नहीं. अपनी कम चलायी, दूसरों की ज्यादा सुनी. इसलिए समझ ही नहीं पाया कि कब राष्ट्र ने मुझसे पूरी तरह पीछा छुड़ा लिया और राष्ट्रपिता को तस्वीर बनाकर दीवार पर टांग दिया.

मुन्नाभाई ने चेताया, तब मुझे खयाल आया कि वाकई अब राष्ट्र को मेरी जरूरत नहीं है. फिर भी राष्ट्रपिता कहलाने का मेरा मोह नहीं छूटा. फिर एक गुजराती ने मुझको वापस गुजराती बना दिया. गोडसे के नाम के आगे जी लगा दिया, सावरकर को ऑफिशियली वीर बना दिया और मेरे हाथ में लाठी की जगह झाडू पकड़ा दिया.

फिर भी पांच साल इसी मुगालते में रहा कि देश को स्वच्छ तो करा रहा हूं, राष्ट्र के किसी काम तो आ रहा हूं. पर अब वह काम भी खत्म. शौच करने को जगह हो न हो, पर देश खुले में शौच करने से मुक्त! अब और क्या देखने को रुकूं? अब और नहीं. अब तो जाने दो.

The Prime Minister, Shri Narendra Modi launching the cleanliness drive for Swacch Bharat Mission from Valmiki Basti, in New Delhi on October 02, 2014.

2014 में दिल्ली की वाल्मीकि बस्ती में सफाई करते प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी. (फोटो साभार: पीआईबी)

इमरान खान से लेकर देसी विपक्ष तक मेरे इस्तीफे को सरकार के विरोध से जोड़ने की कोशिश कोई न करे. कश्मीर के लॉकडाउन और गिरफ्तारियों पर इस्तीफा देना होता, तो मैंने इमरजेंसी में ही दे दिया होता. लिंचिंग, एनआरसी, नागरिकता संशोधन कानून वगैरह के विरोध से भी मेरे इस्तीफे का कोई संबंध नहीं है.

वास्तव में मेरे इस्तीफे का किसी के विरोध से कोई संबंध ही नहीं है. अंग्रेजी राज के बाद किसी राज का विरोध करने में मैं नहीं पड़ा. मेरा इस्तीफा सकारात्मक है. मैं तो कहूंगा कि मेरा इस्तीफा राष्ट्रहित में जरूरी है.

हर रोज जवाहरलाल की गलतियां दुरुस्त की जा रही हैं. इससे पहले कि मेरी गलतियां दुरुस्त करने का नंबर आए, मैं खुद ही राष्ट्रपिता पद से अलग हो जाता हूं. सरकार को राष्ट्रपिता की गलतियां दुरुस्त करने में हिचक नहीं होनी चाहिए.

वैसे भी जब राष्ट्र को सचमुच दिन में अठारह-अठारह घंटे काम करने वाला पिता मिल गया है, और ऐसा-वैसा नहीं ट्रंपजी द्वारा सलेक्टेड और देशवासियों द्वारा इलेक्टेड, उसके बाद मेरे राष्ट्रपिता बने रहने की क्या तो जरूरत है और क्या औचित्य है?

शास्त्रों में तो कहा ही गया है कि समय प्रतिकूल हो तो चुप होकर बैठ रहना ही अच्छा होता है. शपथपूर्वक कहता हूं कि मेरा इस्तीफा, विरोध में बोलना नहीं, समय गुजर जाने पर चुप होकर बैठ रहना है. बस मेरा त्यागपत्र स्वीकार करें, मुझे पूर्व-राष्ट्रपिता हो जाने दें और कम से कम डेढ़ सौ साल के बाद तो लंबी तानकर सो जाने दें.

धन्यवाद.

आपका ही,
मोहनदास

(राजेंद्र शर्मा लोकलहर साप्ताहिक के संपादक हैं.)

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