Wednesday, 27 November 2019

असम के नज़रबंदी शिविरों में 2016 से अब तक 28 बंदियों की मौत हुई: सरकार

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गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान एक सवाल के जवाब में बताया कि असम के छह नज़रबंदी शिविरों 988 विदेशी नागरिकों को रखा गया है.

(फोटो: पीटीआई)

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नई दिल्ली: केंद्र सरकार ने बुधवार को बताया कि असम में गैरकानूनी तरीके से रह रहे विदेशी नागरिकों की नज़रबंदी के लिए संचालित छह शिविरों में 2016 से अब तक 28 लोगों की विभिन्न बीमारियों के कारण मौत हुई है.

गृह राज्य मंत्री नित्यानंद राय ने राज्यसभा में प्रश्नकाल के दौरान एक सवाल के जवाब में बताया कि 2016 से इस साल 13 अक्टूबर तक असम के छह नज़रबंदी शिविरों में रखे गए 28 लोगों की मौत हुई. उन्होंने बताया कि इन शिविरों में 988 विदेशी नागरिकों को रखा गया है.

मृतकों को हर्जाना देने संबंधी पूरक प्रश्न के जवाब में राय ने कहा कि गैरकानूनी ढंग से देश में आने वाले और रहने वालों के पकड़े जाने पर नज़रबंदी के दौरान बीमारी के कारण मौत होने पर मुआवजा या हर्जाना देने का कोई प्रावधान नहीं है.

इन शिविरों में चिकित्सा सुविधाओं के अभाव की आशंका को गलत बताते हुए राय ने कहा कि असम सरकार द्वारा प्राप्त जानकारी के मुताबिक, नज़रबंदी केंद्र सभी मूलभूत सुविधाओं और चिकित्सा देखभाल की मूलभूत सुविधाओं से लैस हैं.

राय ने कहा कि प्रत्येक नज़रबंदी केंद्र में मेडिकल स्टाफ के साथ अंदर ही अस्पताल की सुविधा उपलब्ध होती है. इनमें डॉक्टरों द्वारा बंदियों की नियमित जांच की जाती है.

मालूम हो कि असम में इस साल मार्च तक कुल 1.17 लाख लोगों को विदेशी घोषित किया गया था. बीते जुलाई महीने में लोकसभा में एक सवाल के जवाब में केंद्रीय गृह राज्य मंत्री जी. किशन रेड्डी ने बताया था कि 31 मार्च 2019 तक कुल 1,17,164 लोगों को न्यायाधिकरणों ने विदेशी घोषित किया. 100 विदेशी न्यायाधिकरण असम के विभिन्न ज़िलों में चल रहे हैं.

उच्चतम न्यायालय के 17 दिसंबर 2014 के एक आदेश के मुताबिक गुवाहाटी उच्च न्यायालय की एक विशेष पीठ इन न्यायाधिकरणों के कामकाज की नियमित रूप से निगरानी कर रही है. इसी साल जून महीने में केंद्र सरकार ने न्यायाधिकरणों की संख्या बढ़ाकर 1000 तक करने की बात की थी.

बता दें कि 31 अगस्त को एनआरसी की अंतिम सूची जारी होने से पहले इन विदेशी न्यायाधिकरणों के कई फैसलों की वजह से असम में विवाद की स्थिति बनी हुई थी. न्यायाधिकरणों द्वारा लोगों को विदेशी नागरिक घोषित करने की प्रक्रिया पर सवाल भी उठे थे.

इसी साल मई महीने में कारगिल युद्ध में शामिल रहे सेना के पूर्व अधिकारी मोहम्मद सनाउल्लाह को विदेशी घोषित कर उन्हें नज़रबंदी शिविर भेज दिया गया था. हालांकि कुछ दिन बाद ही उन्हें नज़रबंदी शिविर से रिहा कर दिया गया. उनके परिवार ने विदेशी न्यायाधिकरण के इस फैसले के खिलाफ गुवाहाटी हाईकोर्ट में याचिका दाखिल की थी.

इसी तरह एक बुजुर्ग महिला को भी विदेशी घोषित कर नज़रबंदी शिविर में भेज दिया गया था, उन्हें तीन साल हिरासत में रखने के बाद रिहा किया गया. इस मामले में पुलिस ने स्वीकार किया था कि वह गलत पहचान की शिकार हुईं. दरअसल मधुमाला दास की जगह 59 वर्षीय मधुबाला मंडल को हिरासत शिविर में भेज दिया गया था.

बीते जुलाई महीने में नागरिकता संशोधन विधेयक और एनआरसी को लेकर उठ रहे सवालों के बीच असम के एक वरिष्ठ भाजपा नेता पवन कुमार राठी को भी ‘विदेशी नागरिक’ घोषित कर दिया गया था. एनआरसी के मसौदे में नाम न होने के बाद 56 साल के राठी को ‘विदेशी’ घोषित किया गया था.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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