Wednesday, 27 November 2019

सुप्रीम कोर्ट में जम्मू कश्मीर में पाबंदियों के ख़िलाफ़ याचिकाओं पर सुनवाई पूरी, फ़ैसला सुरक्षित

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जम्मू कश्मीर में अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को हटाने के साथ ही वहां संचार माध्यमों पर लगी पाबंदियों को चुनौती देते हुए कांग्रेस नेता गुलाम नबी आज़ाद, कश्मीर टाइम्स की संपादक अनुराधा भसीन और अन्य लोगों ने याचिकाएं दायर की थीं.

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट ने जम्मू कश्मीर में संविधान के अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म करने के बाद वहां लगायी गई पाबंदियों को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर बुधवार को सुनवाई पूरी कर ली. इस मामले में अदालत फैसला बाद में सुनाएगा.

जस्टिस एनवी रमण, जस्टिस आर. सुभाष रेड्डी और जस्टिस बीआर गवई की पीठ ने कांग्रेस के वरिष्ठ नेता गुलाम नबी आजाद और कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक अनुराधा भसीन और कई अन्य की याचिकाओं पर सभी पक्षों को विस्तार से सुनने के बाद कहा कि फैसला बाद में सुनाया जाएगा.

आजाद की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता कपिल सिब्बल ने कहा कि जम्मू कश्मीर में राष्ट्रीय सुरक्षा के मसले को वह समझते हैं लेकिन इस वजह से घाटी की समूची 70 लाख की आबादी को ताले में बंद नहीं किया जा सकता.

अनुराधा भसीन की ओर से अधिवक्ता वृंदा ग्रोवर ने इन पाबंदियों को ‘असंवैधानिक’ बताया और कहा कि इन प्रतिबंधों आनुपातिक परीक्षण से गुजरना होगा.

जम्मू कश्मीर प्रशासन की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म करने के बाद पूर्व राज्य में इंटरनेट सेवाओं पर लगायी गई पाबंदियों को मंगलवार को न्यायोचित ठहराया था.

मेहता ने कहा था कि उनकी लड़ाई भीतर सक्रिय दुश्मनों से ही नहीं बल्कि सीमापार से सक्रिया शत्रुओं से भी है. उन्होंने अनुच्छेद 35 ए हटाए जाने के खिलाफ पूर्व मुख्यमंत्री महबूबा मुफ्ती और नेशनल कॉन्फ्रेंस पार्टी के नेताओं के भाषणों और सोशल मीडिया पर अपलोड पोस्ट का हवाला दिया.

अनुच्छेद 35ए राज्य के स्थाई निवासियों को विशेष अधिकार प्रदान करता था और अनुच्छेद 370 में राज्य को विशेष दर्जा प्रदान करने संबंधी प्रावधान थे.

मेहता ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ट्विटर का जिक्र करते हुए कहा कि पाकिस्तानी सेना, अफ़गान तालिबान और अन्य आतंकी समूहों के आधिकारिक ट्विटर हैंडल्स पर जम्मू कश्मीर की जनता को भड़काने वाले हजारों संदेश हैं.

सॉलिसिटर जनरल ने कहा कि पाकिस्तानी सेना का दुष्प्रचार चल रहा है. यदि हमने एहतियाती कदम नहीं उठाए होते तो हम अपने कर्तव्यों का निर्वहन करने मे विफल हो जाते.

उन्होंने कहा कि इसका एकमात्र समाधान यही है कि या तो आप इंटरनेट सेवा रखें या नहीं क्योंकि इन्हें अलग करना, विशेषकर इतने बड़े क्षेत्र में, बहुत ही मुश्किल काम है. वहां निषेधाज्ञा लगायी गई ताकि लोग एकत्र नहीं हो सकें क्योंकि ऐसा होने पर कानून व्यवस्था की समस्या खड़ी हो सकती थी.

केंद्र ने भी 21 नवंबर को अनुच्छेद 370 के अधिकांश प्रावधान खत्म किए जाने के बाद जम्मू कश्मीर में लगायी गई पाबंदियों को न्यायोचित ठहराया था. केंद्र कहा था कि एहतियात के तौर पर उठाए गए कदमों की वजह से घाटी में एक भी व्यक्ति की जान नहीं गई और न ही सुरक्षा बल को एक भी गोली चलानी पड़ी.

केंद्र ने कश्मीर घाटी में आतंकी हिंसा का जिक्र किया था और कहा था कि पिछले कई साल से सीमा पार से आतंकवादियों को यहां भेजा जा रहा है, स्थानीय उग्रवादियों और अलगाववादी संगठन ने नागरिकों को बंधक बना रखा था. ऐसी स्थिति में यदि सरकार ने नागरिकों के जीवन की सुरक्षा के लिए एहतियाती कदम नहीं उठाये होते, तो यह बहुत ही मूर्खतापूर्ण होता.

इससे पहले 20 नवंबर को गृहमंत्री अमित शाह ने कहा था कि घाटी में हालात बिल्कुल सामान्य हैं. उन्होंने पुलिस की गोली से एक भी व्यक्ति की जान नहीं जाने का दावा भी किया था.

उन्होंने राज्यसभा को बताया था कि रात के 8 बजे से सुबह के 6 बजे के बीच छोड़कर जम्मू कश्मीर के 195 पुलिस स्टेशनों में से किसी में भी धारा 144 लागू नहीं है. उन्होंने यह भी कहा था कि स्कूलों में उपस्थिति 98 फीसदी है और जम्मू कश्मीर प्रशासन के संतुष्ट पर ही इंटरनेट सेवाओं को चालू किया जाएगा.

वहीं, केंद्रीय गृह राज्यमंत्री जी किशन रेड्डी ने राज्यसभा में बताया था कि 4 अगस्त से कश्मीर घाटी में नेताओं, अलगाववादियों और पत्थरबाजों सहित 5,161 लोगों की गिरफ्तारियां हुई हैं. इसमें से 218 पत्थरबाजों के साथ 609 लोगों को फिलहाल हिरासत में रखा गया है.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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