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Sunday, 21 July 2019

झारखंड में जजों की पदोन्नति सूची में एक भी आदिवासी जज का नाम नहीं

झारखंड जनाधिकार महासभा ने अतिरिक्त जिला जजों के प्रमोशन की एक सूची जारी की है, जिससे साफ है कि जिन भी 51 जूनियर जजों का प्रमोशन किया गया है उनमें एक भी आदिवासी नहीं है और अधिकतर जज ऊंची जातियों के हैं.

Jharkhand_High_Court-WikimediaCommons

झारखंड हाई कोर्ट (फोटो साभारः विकीमीडिया कॉमन्स)

नई दिल्लीः झारखंड जनाधिकार महासभा ने शनिवार को आरोप लगाया कि राज्य में हाल ही में जिन जजों का प्रमोशन किया गया है, उनमें एक भी आदिवासी जज नहीं है.

महासभा ने अतिरिक्त जिला जजों के प्रमोशन की एक सूची जारी की है, जिससे साफ है कि जिन 51 जूनियर जजों का प्रमोशन किया गया है उनमें एक भी आदिवासी नहीं है और अधिकतर जज ऊंची जातियों के हैं.

इस संगठन से जुड़ी एक वकील ने पहचान उजागर नहीं करने की शर्त पर बताया कि राज्य की न्यायपालिका में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व बहुत खराब है. यह झारखंड जैसे राज्य की बहुत ही गंभीर समस्या है. झारखंड की स्थापना ही आदिवासियों को उनकी पहचान और हक देने के लिए की गई थी.

कार्यकर्ता एलिना होरो ने कहा, ‘न्यायपालिका में चार स्तरीय संरचना है. एक बार आपकी नियुक्ति होने पर आप न्यायिक मजिस्ट्रेट या जूनियर डिविजन स्तर के जज के तौर पर काम शुरू करते हैं. इसके बाद प्रमोशन के बाद आप वरिष्ठ स्तर के जज के तौर पर काम करते हैं और इसके बाद अतिरिक्त जिला जज और अंत में जिला जज बनते हैं. झारखंड में मौजूदा न्यायिक व्यवस्था ऐसी है कि आपको वरिष्ठ स्तर पर और उससे ऊपर मुश्किल से ही कोई आदिवासी जज मिले.’

कार्यकर्ता महासभा से भी जुड़े हुए हैं. यह दर्शाता है कि झारखंड की सरकारें न्यायपालिका में आदिवासियों के प्रतिनिधित्व को लेकर किस दर उदासीन बनी हुई है.

उन्होंने कहा, ‘कुछ अपवादों को छोड़ दें तो राज्य में आदिवासी मामलों, उनकी परंपराओं और प्रथाओं को समझने वाले जजों की कमी है और इस जानकारी की कमी उनके फैसलों से झलकती है.’

हालांकि, महासभा मध्य और वरिष्ठ स्तर की न्यायपालिका में आदिवासियों का प्रतिनिधित्व नहीं होने का रोना रो रहा है लेकिन हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल और अंबुज नाथ की राय इससे अलग है.

उन्होंने द वायर को बताया, ‘नियमों और विनियमों को ध्यान में रखते हुए प्रमोशन किए गए. सभी 51 जजों को उनकी योग्यता के आधार पर साक्षात्कार के लिए बुलाया गया था. जूनियर स्तर पर कई आदिवासी जज हैं लेकिन उनमें से कोई भी अतिरिक्त जिला जज के पद के लिए प्रमोशन के मापदंडों को पूरा नहीं कर पाया. हमने नियमों के अनुरूप ही सारी प्रक्रियाओं का पालन किया.’

अंबुज नाथ ने कहा कि अदालतों द्वारा स्थापित किए गए नियमों के अनुसार ही प्रमोशन किए गए। उन्होंने कहा कि झारखंड में प्रत्यक्ष न्यायिक नियुक्तियों के लिए आरक्षण नीति 2007 में लागू हुई थी.

उन्होंने कहा, ‘उससे पहले राज्य में किसी भी स्तर पर कोई आदिवासी जज नहीं था. 2007 के बाद इनकी नियुक्तियां की गईं. फिलहाल, ये (आदिवासी) अतिरिक्त जिला जज के पद के लिए योग्यता शर्तों पर खरे नहीं उतरे. अगर भविष्य में इन योग्यता कसौटियों पर ये खरे उतरेंगे तो इनका भी प्रमोशन किया जाएगा.’

अंबुज नाथ ने कहा कि न्यायपालिका में प्रमोशन वरिष्ठता, परफॉर्मेंस जैसे कई कारकों पर आधारित होता है.

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