सुप्रीम कोर्ट पहुंचा सोशल मीडिया प्रोफाइल को आधार से जोड़ने की मांग का मामला - Badhata Rajasthan - नई सोच नई रफ़्तार

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Tuesday, 20 August 2019

सुप्रीम कोर्ट पहुंचा सोशल मीडिया प्रोफाइल को आधार से जोड़ने की मांग का मामला

सुप्रीम कोर्ट फेसबुक की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है जिसमें यूजर के सोशल मीडिया अकाउंट को आधार नंबर से जोड़ने की मांग करने वाले मामलों को मद्रास, बंबई और मध्य प्रदेश के हाईकोर्ट से सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित करने की मांग की गई है.

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

सुप्रीम कोर्ट. (फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: सुप्रीम कोर्ट फेसबुक इंक की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया है जिसमें उपयोगकर्ता के सोशल मीडिया अकाउंट को आधार नंबर से जोड़ने की मांग करने वाले मामलों को मद्रास, बंबई और मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालयों से सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित करने की मांग की गई है.

सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र, गूगल, ट्विटर, यूट्यूब और अन्य को नोटिस भेज कर 13 सितंबर तक जवाब देने को कहा. जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा कि जिन पक्षों को नोटिस जारी नहीं किए गए हैं उन्हें ईमेल से नोटिस भेजे जाएं.

पीठ ने कहा कि उपयोगकर्ता के सोशल मीडिया प्रोफाइल को आधार से जोड़ने के जो मामले मद्रास हाईकोर्ट में लंबित हैं उन पर सुनवाई जारी रहेगी लेकिन कोई अंतिम फैसला नहीं दिया जाएगा. इस मामले पर अगली सुनवाई बुधवार को होनी है.

गौरतलब है कि तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से सोमवार को कहा था कि फर्जी खबरों के प्रसार, मानहानि, अश्लील, राष्ट्र विरोधी एवं आतंकवाद से संबंधित सामग्री के प्रवाह को रोकने के लिए सोशल मीडिया अकाउंट को उसके उपयोगकर्ताओं के आधार नंबर से जोड़ने की आवश्यकता है.

फेसबुक इंक तमिलनाडु सरकार के इस सुझाव का इस आधार पर विरोध कर रहा है कि 12-अंकों की आधार संख्या को साझा करने से उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता नीति का उल्लंघन होगा.

फेसबुक इंक ने कहा कि वह तीसरे पक्ष के साथ आधार संख्या को साझा नहीं कर सकता है क्योंकि त्वरित मैसेजिंग ऐप व्हाट्सऐप के संदेश को कोई और नहीं देख सकता है और यहां तक कि उनकी भी पहुंच नहीं है.

लाइव लॉ के अनुसार, मद्रास हाईकोर्ट में दायर मामले के स्थानांतरण का विरोध करते हुए तमिलनाडु सरकार की ओर से सुप्रीम कोर्ट में पेश होते हुए अटॉर्नी जनरल केके वेणुगोपाल ने कहा, ‘आधार के साथ सोशल मीडिया अकाउंट को जोड़ने से फेक न्यूज, पोर्नोग्राफी, राष्ट्रद्रोही सामग्रियों और साइबर दुरुपयोग को फैलने से रोकने में मदद मिलेगी.’

उन्होंने आगे कहा, ‘मद्रास हाईकोर्ट में कई सुनवाइयां हुई हैं. मामले की सुनवाई जल्द ही पूरी हो जाएगी और एक महीने में फैसला आ सकता है.उन्हें (फेसबुक) इस पर आपत्ति नहीं जतानी चाहिए.’

इस दौरान उन्होंने ब्लू व्हेल गेम के कारण फैले भय का भी उल्लेख किया. उन्होंने कहा, ‘ब्लू व्हेल गेम की चुनौतियों का सामना करते हुए कई भारतीयों ने अपनी जान दे दी. ऐसी कोई प्रणाली नहीं है जिससे उसे शुरू करने वाले का पता लगाया जा सके. आज भी भारत सरकार इस मामले को सुलझाने का प्रयास कर रही है.’

उन्होंने कहा कि सोशल मीडिया की दिग्गज कंपनी का दावा है कि दो लोगों के बीच होने वाले व्हाट्सएप संदेशों के आदान-प्रदान को कोई तीसरा नहीं पढ़ सकता है और न ही देख सकता है, लेकिन भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थान के एक प्रोफेसर का कहना है कि संदेश को लिखने वाले का पता लगाया जा सकता है.

वेणुगोपाल ने कहा, ‘अगर किसी मैसेज के मूलस्त्रोत का पता चल सके, खासकर आपराधिक मामलों में तो यह हमारे लिए बहुत अच्छा होगा.’

फेसबुक इंक के वकील वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने कहा कि इस तरह की महत्व के मुद्दों को केवल सुप्रीम कोर्ट द्वारा सुना जाना चाहिए न कि किसी हाईकोर्ट द्वारा. जब केंद्र सरकार मामले की जांच कर रही है तब राज्य सरकार ऐसा फैसला नहीं ले सकती है कि वह फेसबुक को उपयोगकर्ताओं का डेटा साझा करने का निर्देश दे.

रोहतगी ने यह भी कहा कि फेसबुक-व्हाट्सएप प्रोइवेसी पॉलिसी से जुड़ा हुआ मामला सुप्रीम कोर्ट में लंबित है. इस पर रोहतगी ने पूछा कि फिर आखिर क्यों तमिलनाडु सरकार इस मामले को मद्रास हाईकोर्ट में निपटाना चाहती है.

वहीं, व्हाट्सएप की ओर से पेश होते हुए वरिष्ठ वकील कपिल सिब्बल ने कहा, ‘व्हाट्सएप में दो लोगों के बीच होने वाले व्हाट्सएप संदेशों के आदान-प्रदान को किसी तीसरे द्वारा नहीं पढ़ सकने और न ही देख सकने के मुद्दे को लेकर केंद्र चिंतित है और इस मामले को देख रहा है. यह भारत सरकार का नीतिगत मुद्दा है.’

सुनवाई के दौरान पीठ ने कहा, ‘हमें ऑनलाइन निजता के अधिकारों और भय फैलाने और ऑनलाइन अपराध करने वाले की पहचान करने के कर्तव्य के बीच एक सामंजस्य बैठाने की जरुरत है.’

स्थानांतरण याचिका में कहा गया है कि याचिका में आईटी एक्ट, 2000 और आधार अधिनियम, 2016 जैसे केंद्रीय कानूनों की व्याख्या जैसे मामले शामिल हैं इसलिए आदर्श स्थिति यह होगी कि मामले की सुनवाई सुप्रीम कोर्ट करे.

(समाचार एजेंसी भाषा से इनपुट के साथ)

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