Friday, 18 October 2019

यूएपीए संशोधन संबंधी दस्तावेज़ राष्ट्रीय सुरक्षा के कारण नहीं दिए जा सकते हैं: गृह मंत्रालय

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विशेष रिपोर्ट: अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को हटाकर जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा ख़त्म करने के संबंध में आरटीआई के तहत द वायर की ओर से मांगी गई जानकारी देने से भी गृह मंत्रालय ने मना कर दिया है.

New Delhi: Union Home Minister Amit Shah speaks during the flag-off ceremony of the Delhi-Katra Vande Bharat Express from the New Delhi Railway Station, in New Delhi, Thursday, Oct. 3, 2019. (PTI Photo/Manvender Vashist) (PTI10_3_2019_000102B)

केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह. (फाइल फोटो: पीटीआई)

नई दिल्ली: केंद्रीय गृह मंत्रालय ने कहा है कि वे यूएपीए संशोधन विधेयक, 2019 संबंधी दस्तावेज़ राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में नहीं दे सकते हैं. इसके अलावा मंत्रालय ने अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को खत्म कर जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा समाप्त करने के संबंध में भी कोई जानकारी देने से मना कर दिया है.

द वायर ने सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत दो आवेदन दायर कर ये जानकारी मांगी थी, हालांकि दोनों मामलों में ही सरकार ने जवाब देने से मना कर दिया.

गृह मंत्रालय का ये जवाब ऐसे समय पर आया है जब कुछ दिन पहले ही केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने आरटीआई लागू होने के 14 साल पूरे होने पर कहा था कि उनकी सरकार ने पहले ही काफी जानकारी सार्वजनिक कर दी है, इसलिए लोगों को आरटीआई दायर करने की जरूरत नहीं पड़ती है.

संसद ने इसी साल जुलाई महीने में गैरकानूनी गतिविधियां (रोकथाम) संशोधन विधेयक (यूएपीए), 2019 को मंजूरी दे दी. इस विधेयक के तहत केंद्र को किसी व्यक्ति को आतंकवादी घोषित करने का अधिकार मिल गया है. विधेयक को असंवैधानिक बताते हुए इसे सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.

द वायर ने आरटीआई दायर कर इस विधेयक पर कैबिनेट से मंजूरी लेने के लिए बनाए गए कैबिनेट नोट, विधेयक के संबंध में हुए सभी पत्राचार और फाइल नोटिंग्स की कॉपी मांगी थी.

यह भी पूछा गया था कि विधेयक के लिए किसी भी कमेटी या आयोग से कोई सुझाव या सिफारिश मिली हो तो वो जानकारी भी दी जाए. हालांकि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने राष्ट्रीय सुरक्षा का हवाला देते हुए इन सभी बिंदुओं पर जानकारी देने से मना कर दिया.

गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में कहा, ‘ये जानकारी राष्ट्रीय सुरक्षा के हित में आरटीआई कानून की धारा 8(1)(ए) और धारा 24 के तहत नहीं दी जा सकती है.’

जबकि आरटीआई कानून की धारा 8(1)(आई) में लिखा है कि फैसला लेने के बाद, जिस आधार पर फैसला लिया गया है उससे संबंधी सभी दस्तावेज़, मंत्री परिषद के निर्णय एवं उनके कारण सार्वजनिक किए जाने चाहिए. यूएपीए संशोधन विधेयक, 2019 जुलाई महीने में ही पारित हो चुका है और भारत के राजपत्र में प्रकाशित भी हो चुका है.

इससे स्पष्ट हो जाता है कि फैसला लिया जा चुका है और मामला पूरा हो चुका है. इस तरह आरटीआई कानून की धारा 8(1)(आई) की पहली शर्त के तहत ये जानकारी दी जानी चाहिए थी, हालांकि मंत्रालय ने इसे देने से मना कर दिया. जबकि द वायर ने अपने आरटीआई आवेदन में ही इन शर्तों का हवाला दे दिया था.

इसके अलावा यहां पर केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) का एक निर्णय काफी महत्वपूर्ण है. जून 2012 के एक फैसले में, सीआईसी ने एक निर्देश जारी किया था कि संसद में पेश किए जाने वाले विधेयकों से संबंधित सभी कैबिनेट नोट्स और दस्तावेज़ों को अगले सात दिनों के भीतर सार्वजनिक किया जाना चाहिए.

ये फैसला देने वाले तत्कालीन सूचना आयुक्त शैलेश गांधी ने कहा, ‘सूचना देने से मना करते वक्त ये बताना चाहिए कि किस आधार पर इन धाराओं के तहत जानकारी नहीं दी जा सकती है. मनमानी तरीके से जानकारी देने से मना करने का चलन बन गया है. आरटीआई एक्ट में बिल्कुल साफ लिखा है कि जब किसी विधेयक को पास कराने का मामला पूरा हो चुका हो तो ये सारी जानकारी दी जानी चाहिए.’

गृह मंत्रालय ने जानकारी देने से मना करने के लिए आरटीआई कानून की धारा 8(1)(ए) और धारा 24 का हवाला दिया है. धारा 8(1)(ए) के तहत ऐसी जानकारी देने से छूट प्राप्त है जिससे भारत की एकता एवं अखंडता, राज्य की सुरक्षा, रणनीतिक, वैज्ञानिक या आर्थिक हित और विदेश से संबंध प्रभावित होते हों.

वहीं आरटीआई कानून की धारा 24 के तहत खूफिया और सुरक्षा संगठन जैसे कि आईबी, बीएसएफ, रॉ, ईडी, सीआरपीएफ, आईटीबीपी इत्यादि के संबंध में जानकारी देने से छूट प्राप्त है. हालांकि इसमें भी शर्त है कि अगर मांगी गई सूचना भ्रष्टाचार के आरोप और मानवाधिकार उल्लंघन से संबंधित है तो ऐसी जानकारी दी जानी चाहिए.

गृह मंत्रालय के जन सूचना अधिकार प्रवीण कुमार राय ने जवाब देते हुए ऐसा कोई तर्क नहीं दिया कि आखिर मांगी गई जानकारी किस आधार पर इन धाराओं के तहत देने से मना की जा सकती है.

गांधी ने कहा, ‘प्रथम दृष्टया ऐसा नहीं लगा कि ये जानकारी धारा 24 के तहत नहीं दी जा सकती है. फिर भी अगर किसी दस्तावेज़ में ऐसी कोई जानकारी है, जो नहीं दी जा सकती है तो उतनी जानकारी को हटाकर बाकी की जानकारी आरटीआई एक्ट की धारा 10 के तहत दी जानी चाहिए.’

इसी साल जुलाई महीने में आरटीआई के तहत सर्वोच्च अपीलीय संस्था केंद्रीय सूचना आयोग ने अपने एक बेहद महत्वपूर्ण फैसले में कहा था कि सूचना देने से छूट प्राप्त धाराओं का मनमाने तरीके से उल्लेख करना बिल्कुल गलत है. आयोग ने कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) को कड़ी फटकार लगाते हुए कहा था कि ऐसा करना गलत प्रचलन को बढ़ावा देता है.

अनुच्छेद 370 पर जानकारी नहीं दी गई

इसी साल पांच अगस्त को भारत सरकार ने एक अप्रत्याशित फैसला लेते हुए जम्मू कश्मीर का विशेष दर्जा खत्म कर दिया और राज्य को दो टुकड़ों में बांटकर उसे केंद्र शासित प्रदेश बना दिया.

जहां एक तरफ जम्मू कश्मीर के लोग इस फैसले से काफी प्रभावित हैं और उनसे बातचीत किए बिना फैसला लेने को लेकर नाराज हैं, वहीं दूसरी तरफ गृह मंत्रालय ने इस जानकारी का भी खुलासा करने से मना कर दिया है कि ये फैसला किस आधार पर लिया गया था.

द वायर ने इस फैसले के खिलाफ भी अपील दायर की थी, हालांकि यहां से भी निराशा हाथ लगी और अपील खारिज करते हुए अपीलीय अधिकारी ने जन सूचना अधिकारी के जवाब को बरकरार रखा.

केंद्रीय गृह मंत्रालय से आरटीआई के जरिये अनुच्छेद 370 के अधिकतर प्रावधानों को खत्म करने के संबंध में तैयार किए गए कैबिनेट नोट, प्रधानमंत्री कार्यालय एवं जम्मू कश्मीर राज्य समेत सभी जरूरी विभागों के साथ हुए पत्राचार, फाइल नोटिंग्स और ऐसा फैसला लेने के लिए किसी भी कमेटी या आयोग से भेजे गए कोई सुझाव या सिफारिश की प्रति मांगी थी.

आश्चर्यजनक रूप से मंत्रालय ने आरटीआई कानून की धारा 8(1) के विशेष प्रावधान के बजाय कई प्रावधानों का हवाला देते हुए जानकारी देने से मना कर दिया. मंत्रालय ने लिखा, ‘आपके द्वारा मांगी गई जानकारी आरटीआई एक्ट 2005 की धारा 8(1) के प्रावधानों के तहत आती है इसलिए नागरिक को ऐसी जानकारी देने की कोई बाध्यता नहीं है.’

मंत्रालय के सीपीआईओ टी. श्रीकांत ने कोई कारण नहीं बताया कि आखिर किस आधार पर इन धाराओं के तहत ये जानकारी नहीं दी जा सकती. धारा 8(1) के अलग-अलग प्रावधानों के तहत विभिन्न प्रकार की जानकारी देने से छूट दी गई है. सीपीआईओ ने जिन प्रावधानों का उल्लेख कर जानकारी देने से मना किया है उसके संबंध में जानकारी मांगी ही नहीं गई थी.

मसलन एक्ट की धारा 8(1)(बी) कहती है कि ऐसी कोई जानकारी जिसे किसी कोर्ट या ट्रिब्यूनल ने प्रकाशित करने से रोक दिया है या ऐसी जानकारी जिसके खुलासे से कोर्ट की अवमानना होती है तो ये जानकारी नहीं दी जाएगी.

अनुच्छेद 370 के संबंध में अब तक किसी कोर्ट ने ऐसी किसी जानकारी के खुलासे से रोक नहीं लगाई है. सीपीआईओ ने स्पष्ट ही नहीं किया कि आखिर धारा 8(1) के किस प्रावधान के तहत जानकारी नहीं दी जा सकती है.

चौकाने वाली बात ये है कि मंत्रालय के प्रथम अपीलीय अधिकारी अतिरिक्त सचिव ज्ञानेश कुमार ने भी इस फैसले को सही ठहराया है.

कुमार ने अपने फैसले में लिखा, ‘सीपीआईओ ने सही तरीके से जानकारी देने से मना किया है क्योंकि मांगी गई सूचना आरटीआई एक्ट की धारा 8(1) के प्रावधानों के अंतर्गत आती है.’

अपील में ये हवाला दिया गया था कि चूंकि ये जानकारी व्यापक जनहित से जुड़ी हुई है इसलिए इसे सार्वजनिक की जानी चाहिए. आरटीआई की धारा 8(2) के तहत छूट प्राप्त धारा के अंतर्गत आने वाली सूचना अगर व्यापक जनहित से जुड़ी हुई है और जनहित का पलड़ा किसी विशेष हित के मुकाबले भारी पड़ता है तो ऐसी जानकारी सार्वजनिक की जानी चाहिए.

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