Tuesday, 5 November 2019

आज हिंदुस्तानी मुसलमान को एक नए सामाजिक आंदोलन की ज़रूरत है

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आज बहुत सुनियोजित ढंग से आरएसएस परिवार को छोड़कर सारी आवाज़ों को दबा दिया गया है. अगर कोई आवाज़ें उठती भी हैं, तो सिर्फ वे, जो मुसलमानों को पिछड़ा, दकियानूसी और क़बायली साबित करती हैं.

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(फोटो: पीटीआई)

हिंदुस्तान में साल 2018 में 20.1 करोड़ मुसलमान थे, आज शायद ज्यादा ही होंगे. दुनिया में सिर्फ छह देश ऐसे हैं, जिनकी जनसंख्या बीस करोड़ से ज्यादा है वो हैं चीन, भारत, अमेरिका, इंडोनेशिया, ब्राजील और पाकिस्तान. यानी अगर आज दुनिया में 195 देश हैं, तो भारत के मुसलमानों की जनसंख्या उनमें से 189 देशों से ज्यादा है.

ये तो रही जनरल नॉलेज की बात. अब आते हैं दूसरी बात पर.

अगर आज के टीवी, अखबार और भाजपा के प्रवक्ताओं वगैरह को खंगाला जाए, तो आप आसानी ये हिसाब लगा सकते हैं कि ये ज्यादातर पाकिस्तानी हैं. मतलब पाकिस्तान की जनसंख्या के बराबर पाकिस्तानी हिंदुस्तान में रह रहे हैं.

और इनमें से ज्यादातर यकीन के काबिल नहीं हैं क्योंकि ये 20.1 करोड़ राष्ट्र विरोधी हैं, देशद्रोही हैं. ज्यादातर गजवा-ए-हिंद में मानने वाले इस्लामिस्ट हैं, ज्यादातर आतंकवादियों के हिमायती हैं और कुछ तो खुद आतंकवादी हैं.

सोचिए, एक देश में बीस दशमलव एक करोड़ राष्ट्र विरोधी हैं और ये देश कुछ साल पहले तक 8% की दर से तरक्की कर रहा था. ये तो अपने आप में केस स्टडी होनी चाहिए, हार्वर्ड, येल, ऑक्सफोर्ड में इस पर शोध होना चाहिए कि 20.1 करोड़ लोग अंदर से भारत की जड़ें खोद रहे हैं और फिर भी भारत लगातार न जाने कैसे फास्ट डेवलपिंग देशों की फेहरिस्त में अपनी गति बनाए हुए है?

अब या तो भारत की जड़ें कटाई प्रूफ हैं या टाइटेनियम की बनी हैं कि कट नहीं रही हैं. या ये 20.1 करोड़ मुसलमान बला के बेवकूफ हैं कि सत्तर साल से इस देश की जड़ें काट रहे हैं, और इनसे कट नहीं रही हैं. न जाने कैसी भोंटी आरियों, कैंचियों, दरांती और छेनियों का इस्तेमाल कर रहे हैं!

या शायद जैसा पाकिस्तानी (ओरिजिनल वाले) कहते हैं कि हिंदुस्तानियों का ईमान ही कमजोर है, इसीलिए तो ये वहां रह गए थे. भला कौन-सा मुसलमान, एक मुस्लिम देश छोड़कर एक हिंदू देश में रहेगा?

तो मोटे-मोटे तौर पर ये कुछ बातें हमारे सामने हैं-

  1. एक करोड़ हिंदुस्तानी मुसलमान हिंदुस्तान की जड़ें काटना चाहते हैं.
  2. पर इनकी, आरियां, छेनियां, कैंचियां भोंटी हैं.
  3. इनका ईमान भी कमजोर है. (ओरिजिनल पाकिस्तानियों के हिसाब से)
  4. इनकी अविरल और सतत कटाई के बावजूद भारत 5-8% की दर से आगे बढ़ रहा हैं (मोदी जी के 5%)
  5. या ये बेचारे मुसलमान ऐसा कुछ नहीं कर रहे हैं, बस उसी जिंदगी की जोड़-तोड़ में लगे हैं, जिसमें बाकी हिंदुस्तानी लगे हैं.

अगर ये आखिरी और पांचवां पॉइंट सही है तो फिर ये मीडिया, सोशल मीडिया और हर भाजपा के प्रवक्ता के मुंह से निकालने वाले ज़हर को कोई रोकता क्यों नहीं है? कोई टोकता क्यों नहीं है?

इसका एक आसान सा जवाब है कि मुसलमानों के नेता इसके लिए जिम्मेदार हैं. पर ये मुसलमानों के नेता कौन हैं? ये किसी को नहीं पता क्योंकि मुसलमानों में नेता हैं ही नहीं. कुछ मौलाना हैं, जिनको कोई नहीं जानता, जो टीवी पर आकर बैठ जाते हैं. कुछ टोपी वाले नेता हैं, जो ये तय करते हैं कि हम किसके लिए वोट करेंगे.

मेरे आस पास कई मुसलमान हैं, जो जींस-टीशर्ट पहने घूमते रहते हैं. बड़े पढ़े-लिखे हैं. राइटर हैं, बैंकर हैं, मार्केटिंग में हैं, कुछ आईएस आईपीएस भी हैं. कुछ वकील हैं, कुछ एडवरटाइजिंग में हैं, कुछ डिजाइनर हैं. ये हर रंग, हर आकार-प्रकार के हैं. ये वाले मुसलमान कभी टीवी पर क्यों नहीं दिखते हैं, जो आमतौर पर अंग्रेजी में गिटर-पिटर करते रहते हैं?

हालांकि आजकल कुछ पढ़े-लिखे मुसलमानों की आवाजें सोशल मीडिया जरूर सुनाई देती हैं, पर पॉलिसी, मानवाधिकार आदि के मामलों पर ये सब आवाजें कोई फर्क पैदा नहीं करतीं.

बहुत सुनियोजित ढंग से आरएसएस परिवार को छोड़कर सारी आवाजों को दबा दिया गया है. अगर कोई आवाजें उठती भी हैं, तो सिर्फ वो, जो मुसलमानों को पिछड़ा, दकियानूसी और कबायली साबित करती हैं. लेकिन जैसा मैंने पहले प्रूव कर दिया है कि मुसलमान तो ऐसे नहीं है, तो फिर क्या किया जाए?

ये रहा इसका हल… पढ़े-लिखे मुसलमानों, उठो अपनी नींद से और कमान संभालो. आज हमें जरूरत है एक तंजीम की, एक सामाजिक आंदोलन की. एक ऐसी पॉलिटिकल पार्टी की, जो जींस-टीशर्ट वाले मुसलमानों की भी हो. जो मुसलमानों के मानवाधिकार के लिए लड़े, जो मुसलमानों के बारे में फैली भ्रांतियां तोड़े. जो उन मुसलमानों के दुख-दर्द बांटे, जो आज बदतमीजी के माहौल में पिस रहे हैं.

लेकिन इसके लिए सबसे पहले हमें एक चीज को मुसलमानों से अलग करना होगा. किसी भी जनतंत्र के लिए धर्म को राजनीति से अलग करना जरूरी है. हमें भी इस्लाम को मुसलमान से अलग करना होगा. पढ़े-लिखों, तुम्हें इस्लाम के बारे में कम पता है, वो काम तुम मौलानाओं पर छोड़ दो और मौलानाओं को जनतंत्र का काम पढ़े-लिखों के हवाले करना होगा.

20.1 करोड़ हैं हम और आज हमारी सबसे बड़ी जरूरत है एक नया सामाजिक आंदोलन, एक नया हिंदुस्तानी मुसलमान चेहरा. हमारा मकसद साफ है, अखंडता में एकता, समता और समानता, भाईचारा और बंधुत्व, इंसाफ और पारदर्शिता.

मैं आज तैयार हूं, जो कल नहीं था. ऐसे कई करोड़ों मुसलमान हैं, जो आज इस नए आंदोलन के लिए तैयार हैं. इस देश के आगे बढ़ने के लिए हम हिंदुस्तानी मुसलमान जरूरी हैं, लेकिन उससे पहले हमें खुद को संगठित करना होगा, व्यवस्थित करना होगा. हमें अपनी और दूसरों की आवाज बनना होगा.

मुसलमान होना आज सिर्फ हमारी धार्मिक पहचान नहीं है, ये हमारी सामाजिक पहचान भी है. तो क्यों न हम धार्मिक चीजें धर्म के लिए छोड़ दें और अपनी सामाजिक पहचान को भी कबूल कर एक नई शुरुआत करें. क्यों नहीं हम नए नेता पैदा करें, जो हमारे हक के लिए लड़ें और हमारी आवाज भी बने.

अब वक्त आ गया है इस नए भारत के साथ, एक नए मुसलमान का, जो अपनी तकदीर का खुद मालिक है, जो अपने ख्वाबों का खुद मुहाफिज़ है. जो अगर किसी से ज्यादा नहीं है, तो किसी से कमतर भी नहीं है. अब वक्त आ गया है हम एक साथ कहें, ‘मुस्लिम हैं हम, वतन हैं, हिंदोस्तां हमारा, सारे जहां से अच्छा हिंदोस्तां हमारा.’

(दाराब फ़ारूक़ी पटकथा लेखक हैं और फिल्म डेढ़ इश्किया की कहानी लिख चुके हैं.)

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