Thursday, 7 November 2019

आरटीआई के नए नियम इस क़ानून के अंत की शुरुआत हैं

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हाल ही में लाए गए नए नियमों के अनुसार केंद्र को केंद्रीय और राज्य सूचना आयोग के ऊपर नियंत्रण देना यह सुनिश्चित करेगा कि आरटीआई की अपील पर सरकार की मर्ज़ी के मुताबिक काम हो.

(फोटो साभार: सतर्क नागरिक संगठन)

(फोटो साभार: सतर्क नागरिक संगठन)

12 अक्टूबर को हम सूचना का अधिकार दिवस के तौर पर मना रहे थे, लेकिन सिर्फ 12 दिन बाद हम एक स्वतंत्र सूचना आयुक्त की संस्था के ख़त्म होने का मातम मनाने के लिए मजबूर हो गए. 24 अक्टूबर को केंद्र ने विनाशकारी नए नियमों को अधिसूचित किया.

सूचना का अधिकार (आरटीआई) पर नरेंद्र मोदी सरकार के असली असर को लेकर अनिश्चय और रहस्य का पर्दा हट गया है. सभी सूचना आयुक्तों की स्वायत्तता को पहुंचा नुकसान उम्मीद से भी ज्यादा है. न सिर्फ उनकी स्वतंत्रता को कम कर दिया गया है- बल्कि इस संस्था और इसके मुखिया को सरकार के अधीन कर दिया गया है.

इन नए नियमों का शीर्षक बहुत लंबा है : ‘द राइट टू इंफॉर्मेशन (टर्म ऑफ ऑफिस, सैलेरीज, अलाउंसेज एंड अदर टर्म्स एंड कंडीशंस ऑफ सर्विस ऑफ चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर, इंफॉर्मेशन कमिश्नर्स इन सेंट्रल इंफॉर्मेशन कमीशन, स्टेट चीफ इंफॉर्मेशन कमिश्नर एंड स्टेट इंफॉर्मेशन कमिश्नर इन द स्टेट इंफॉर्मेशन कमीशन) रूल्स, 2019. (संक्षेप में सूचना का अधिकार नियम, 2019/आरटीआई रूल्स, 2019)

महत्वपूर्ण बदलाव

1. केंद्रीय सूचना आयुक्तों और राज्य सूचना आयुक्तों को समान वेतनमान वाले सेवारत लोक सेवकों के समकक्ष कर दिया गया है. मुख्य सूचना आयुक्त को कैबिनेट सेक्रेटरी के समकक्ष कर दिया गया है जबकि अन्य सभी सूचना आयुक्तों को क्रमशः केंद्र या राज्य सरकार की सेवाओं में समान ग्रेड के अधिकारियों के समकक्ष कर दिया गया है.

2. सूचना आयुक्तों का वेतन मुख्य सूचना आयुक्त के वेतन से कम कर दिया गया है, जो एक पदानुक्रम का निर्माण करता है, जिससे सचेत तरीके से मूल कानून में बचा गया था. ऐसा करने से सूचना आयुक्त मुख्य सूचना आयुक्त के मातहत हो जाते हैं, जिसे खुद सरकार के अधीन कर दिया गया है.

3. नियम 22 केंद्र सरकार को भविष्य में किसी श्रेणी या वर्ग के लोगों से संबंधित इन नियमों में से किसी भी नियम में ढील देने का विवेकाधिकार देता है.

4. नियम, 21 केंद्र सरकार को किसी अन्य भत्ते या सेवा शर्तों को लेकर, जो अलग से 2019 के नियम में शामिल नहीं किए गए हैं, फैसला करने का पूर्ण अधिकार देता है और इसका फैसला बाध्यकारी होगा.

5. नियम, 23 केंद्र सरकार को इन नियमों की व्याख्या का आखिरी अधिकार देता है.

कानून ताक़ पर

1. 2019 का संशोधन कानून और नियम 2019, 2005 के सूचना का अधिकार (आरटीआई) के तहत सूचना आयुक्तों को दी गई स्वतंत्रता को नष्ट कर देता है. जो दो अनुच्छेदों में संशोधन करके नहीं किया जा सकता है.

2. राज्य सूचना आयुक्तों पर केंद्र का नियंत्रण संविधान के संघीय चरित्र के खिलाफ है. संघवाद संविधान का बुनियादी ढांचा है और संसद के पास इसे संशोधित करने की शक्ति नहीं है.

3. केंद्र सरकार राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन-भत्तों पर अपनी निधि में से कोई खर्च नहीं कर रही है. इसलिए राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन और सेवा शर्तों को केंद्र द्वारा अपने अधिकारक्षेत्र में लेना न सिर्फ अतार्किक, मनमाना बल्कि गैरकानूनी और असंवैधानिक भी है, क्योंकि यह संघीय ढांचे को ध्वस्त कर देता है.

4. राज्य के सूचना आयुक्तों को संबंधित राज्यों की संचित निधि में से पैसा दिया जा रहा है. राज्य की संचित निधि के पैसे के प्रयोग के तरीके पर केंद्र का कोई नियंत्रण नहीं है, सिवाय तब के जब राज्य राष्ट्रपति शासन के अधीन हो. यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि तीन राज्य के सत्ताधारी दलों- बीजू जनता दल (ओडिशा), वायएसआर कांग्रेस पार्टी (आंध्र प्रदेश) और तेलंगाना राष्ट्र समिति (तेलंगाना) ने एक ऐसे विधेयक का समर्थन किया, जो उनकी शक्तियों में ही सेंध लगाने वाला है.

5. इन संशोधनों और नियमों को लाने से पहले इससे जुड़े लोगों- सूचना आयुक्तों- राज्यों, नागरिक समाज और सांसदों के साथ कोई विचार-विमर्श नहीं किया गया. यह कोई कानून बनाने से पहले मशविरा करने की 2014 की नीति (प्री लेजिस्लेटिव कंसल्टेशन पॉलिसी) का खुला उल्लंघन है. इस नीति के तहत सभी कानूनों के मसौदे को टिप्पणी व सुझावों के लिए सार्वजनिक करना जरूरी है. लेकिन इन नियमों के मसौदे को सार्वजनिक नहीं किया गया और कोई राय-मशविरा नहीं किया गया.

6. सूचना आयुक्तों को केंद्र सरकार के अधीन लाने के विचार के बारे में संसद के दोनों सदनों को भी नहीं बताया गया, जो संसदीय विशेषाधिकार का स्पष्ट उल्लंघन है.

RTI Activists Protest 2 photo The Wire

आरटीआई एक्ट में संशोधन के खिलाफ दिल्ली में हुआ एक प्रदर्शन. (फोटो: द वायर)

आरटीआई का डर

सूचना का अधिकार नागरिकों के हाथ में सरकार से फाइलें मांगने का एक छोटा मगर एक महत्वपूर्ण अधिकार है, जो उनके अन्य अधिकारों को लागू कराने का रास्ता तैयार करता है. सरकारी अधिकारी को कोई पन्ना साझा करने या कोई फाइल दिखाने का निर्देश देने की सूचना आयुक्त की शक्ति भी सीमित है.

कल्पना कीजिए कि इस अधिकार ने नेताओं और नौकरशाहों के दिमाग में कितना डर पैदा किया होगा कि वे अब चाहते हैं कि उनका कोई वफादार ही कमिश्नर की कुर्सी पर बैठे ताकि उनकी जाली डिग्रियां या भ्रष्ट आचरण उजागर न हों. यही इस विध्वंसकारी संशोधन और नए कानून के निर्माण का संभवतः एकमात्र और ठोस मकसद हो सकता है.

मुख्य सूचना आयुक्त अब सरकार के अधीन

2019 के एक्ट और नियम सूचना आयुक्त के दफ्तर को पूरी तरह से केंद्र सरकार के अधीन बना देने वाले हैं, जिसका नतीजा सूचना के अधिकार (आरटीआई) के बेकार हो जाने के तौर पर निकलेगा. आरटीआई संशोधन एक्ट, 2019 ने जहां आयोग की आजादी को नष्ट कर दिया, वहीं इन नियमों ने संस्था को अधीन बनाकर बची-खुची कसर पूरी कर दी है.

इन नियमों की पंक्तियों को पढ़ते हुए यह पता चलता है कि किस तरह से मुख्य सूचना आयुक्त को कानूनी गारंटी के साथ दिए गए मुख्य चुनाव आयुक्त के बराबर के दर्जे को घटा दिया गया है, जो सुप्रीम कोर्ट के जज के समकक्ष होता है. अब उनका दर्जा कम करके उन्हें सेक्रेटरी के बराबर कर दिया गया है, जो किसी के मातहत होकर काम करेगा.

व्यवहार में ज्यादातर मुख्य सूचना आयुक्त आज्ञाकारी किस्म के थे, जबकि आरटीआई एक्ट में उनसे स्वतंत्र रहकर काम करने की उम्मीद की गई थी. अब तो सूचना आयुक्तों के तौर पर नियुक्ति की अर्हता के तौर पर अधीनता और वफादारी पर कानून की मुहर लग गई है. आयुक्तों को यह स्वतंत्रता काफी सोच-विचार, सलाह-मशविरे, सुनवाइयों के बाद संसद की स्थायी समिति द्वारा दी गई थी.

संसद की स्थायी समिति ने मुख्य सूचना आयुक्त को मुख्य चुनाव आयोग का दर्जा दिया था और उन्हें सूचना आयुक्तों के बीच समकक्षों में प्रथम बनाया. सम्मिलित रूप से आयुक्तों से यह अपेक्षा की गई थी कि वे किसी से डरे बिना सार्वजनिक रिकॉर्ड हासिल करने के नागरिक के अधिकार की रक्षा करेंगे. अब उनकी यह क्षमता छीन ली गयी है.

सूचना आयुक्त अब चुनाव आयुक्त के अधीन

मुख्य सूचना आयुक्त को प्रधानमंत्री कार्यालय और डीओपीटी के मातहत करने के बाद केंद्र ने सूचना आयुक्तों को भी मुख्य आयुक्त के अधीन कर दिया है. 2005 के आरटीआई एक्ट में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं की गई थी.

उसके तहत मुख्य सूचना आयुक्त को समकक्षों के बीच प्रथम का दर्जा दिया गया था. लेकिन अब वह बॉस है. यह आयोग और आयुक्तों को कमजोर करने का चालाक तरीका है.

2019 के नियमों ने सूचना आयुक्तों के वेतन को 2.5 लाख से घटाकर 2.25 लाख कर दिया है जिसका मकसद यह स्पष्ट करना है कि मुख्य आयुक्त सेक्रेटरी रैंक का होगा और बाकी आयुक्त ज्वाइंट सेक्रेटरी रैंक के होंगे.

दूसरे नियमों ने उन्हें भारतीय प्रशासनिक सेवा में उतना ही वेतन पा रहे नौकरशाहों के समकक्ष बना दिया. आयुक्तों के बीच की बराबरी जिसके कारण कुछ स्वतंत्र साहसी फैसले देखे गए, अब नामुमकिन होगी.

अफसरशाही से ही आएंगे आयुक्त

चौथा नियम केंद्र को सेवारत नौकरशाहों को तीन साल के लिए नियुक्त करने की शक्ति देता है. नियुक्ति की तारीख से उन्हें सेवानिवृत्त माना जाएगा.

नियुक्ति पर अपनी मूल सेवा से सेवानिवृत्ति- मुख्य सूचना आयुक्त या अन्य सूचना आयुक्त जो कि अपनी नियुक्ति की तारीख को केंद्र या राज्य सरकार में सेवा में थे, उन्हें केंद्रीय सूचना आयोग में मुख्य सूचना आयुक्त या सूचना आयुक्त के तौर पर नियुक्त होने की तारीख से उस सेवा से सेवानिवृत्त माना जाएगा.

यह सिर्फ पूर्व लोक सेवकों को इस पद पर नियुक्त करने की केंद्र की मंशा को उजागर करता है. यह नियम अनुच्छेद 12-5- के उस निर्देश को दरकिनार करता है, जिसमें सरकार से विभिन्न सामाजिक क्षेत्रों से आयुक्तों का चयन करने के लिए कहा गया था. पत्रकारिता या अकादमिक जगत से आयुक्तों की नियुक्ति करने के लिए कोई प्रावधान नहीं रखा गया है.

सूचना आयुक्तों पर केंद्र का नियंत्रण

24 अक्टूबर को 2019 के नियमों को लागू करने के साथ ही केंद्र के पास अब केंद्र और राज्यों के मुख्य सूचना आयुक्त और अन्य सूचना आयुक्तों की हाथ मरोड़ने की शक्ति आ जाएगी. यह मूल आरटीआई एक्ट, 2005 के तहत शक्तियों के वितरण की संघीय व्यवस्था का अंत कर देगा.

नियम, 13 के द्वारा इसने आधिकारिक तौर पर राज्यों के आयुक्तों के भी नौकरशाहीकरण का रास्ता तैयार कर दिया है और नौकरशाही के बाहर किसी व्यक्ति के इस पद पर नियुक्ति की संभावना को कम कर दिया है.

इस संशोधन के तहत बनाए गए नियम मूल आरटीआई एक्ट की मूल आत्मा की हत्या करनेवाले हैं, जो इस परिपाटी के खिलाफ है कि कोई नियम उस मूल कानून की जगह नहीं ले सकता है या उसका उल्लंघन नहीं कर सकता है, जिसके तहत उन्हें बनाया गया था.

केंद्र ने आवश्यकता अनुसार नियम बनाने (नियम 21) की शक्ति और किसी नियम की आखिरी व्याख्या देने की शक्ति (नियम 24) अपने पास रखी है. इसके अलावा इसने इन नियमों में और ढील देने की शक्ति (नियम 22) भी रखी है, जिसका इस्तेमाल उन आयुक्तों को इनाम देने के लिए किया जा सकता है, जो नियमों के प्रति वफादार न होकर शासकों के प्रति वफादार हों.

बेहद कमज़ोर कानून

दुर्भाग्य की बात है कि कोई भी सरकार आरटीआई एक्ट के प्रावधानों को लागू करनेवाले किसी मजबूत सूचना आयुक्त को पसंद नहीं करती है क्योंकि फाइलों की जांच ने सरकारों की काफी फजीहत करवाई है.

2005 में सरकार के राजनीतिक नेतृत्व को लोकतंत्र को मजबूत करने के लिए नागरिकों को यह अधिकार देने की जरूरत के बारे में समझाया जा सका था. लेकिन नौकरशाहों ने इसका जमकर विरोध किया था, जिन्होंने लगातार आरटीआई के मसौदे के पारित होने में रोड़े अटकाए और इसका विरोध किया.

इसके अस्तित्व में आने के बाद कुछ आरटीआई विरोधी अफसर आयुक्तों के पद पर बैठे और उन्होंने कई आरटीआई विरोधी आदेश दिए, जिसने सूचना साझा के आग्रह को खारिज करने में विभागों की मदद की.

नौकरशाही से बाहर काफी कम व्यक्तियों का चयन आयुक्तों के तौर पर हुआ है. लालकृष्ण आडवाणी की सलाह पर आरटीआई कार्यकर्ता शैलेश गांधी को आयुक्त बनाया गया.

आडवाणी उस समय विपक्ष के नेता थे. यह इसलिए संभव हो सका क्योंकि सूचना आयुक्तों को शॉर्टलिस्ट करनेवाली चयन समिति में विपक्ष का नेता शामिल था. (आरटीआई एक्ट, 2005 का अनुच्छेद 12(3) (ii)). (2013 में इस लेखक को आवेदन और बायोडेटा के आधार पर यूपीए सरकार द्वारा विधि क्षेत्र से मुख्य सूचना आयुक्त के तौर पर चुना गया था.)

चयनों से यह जाहिर था कि केंद्र और राज्य सरकारें 90 फीसदी पद नौकरशाहों से भरने को प्राथमिकता देती थीं और विधि, विज्ञान, टेक्नोलॉजी, समाजसेवा, प्रबंधन, पत्रकारिता, मास मीडिया या प्रशासन और शासन आदि क्षेत्रों के नामी लोगों को नजरअंदाज करती थीं, जिसकी व्यवस्था अनुच्छेद 12 (5) में की गई थी.

आयोग को जीवन के हर क्षेत्र का प्रतिनिधि बनाने के एक्ट के उद्देश्य की पूरी तरह से उपेक्षा की गई. तथ्य यह है कि वैसे नौकरशाहों को भी शायद ही कभी आयुक्तों के तौर पर चुना जाता था, जिन्होंने ईमानदार प्रशासन की गुणवत्ता और पारदर्शिता को सुधारने की दिशा में काम किया है.

अनुमान लगाया जा सकता है कि नौकरशाहों के सूचना आयुक्त बनने और ज्यादा सुविधाएं मिलने से सबसे वरिष्ठ अधिकारियों को भी तकलीफ पहुंच रही थी. सूचना आयुक्तों के दर्जे को घटाने की लगातार कोशिशों के पीछे यह भी एक कारण हो सकता है.

लेकिन इस प्रक्रिया में एक अहम अधिकार को कमजोर कर दिया गया है. लेखक को उम्मीद है कि अगर नागरिक समाज कोर्ट में इन मुद्दों को उठाता है तो यह संशोधन न्यायिक पुनर्समीक्षा में धराशायी हो जाएगा.

एम. श्रीधर आचार्युलू पूर्व मुख्य सूचना आयुक्त और स्कूल ऑफ लॉ, बेनेट यूनिवर्सिटी में डीन हैं.

(इस लेख को अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें.)

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